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14 देसर्वधतरपि ॥ वाउकाइय वेउव्वियसरीर पुष्छा ? गोयमा ! सन्वबंधतरं जहण्णेणं
अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पलिओवमस्स असंखेजइभागं । एवं देसबंधंतरपि । तिरिक्खजोणिय पंचिंदिय वेउन्विय सरीरप्पओग बंधंतरं पुच्छा ? गोयमा ! सव्वबंधंतरं जह
११८९ से एक समय का और कोई जीव उदारिक शरीरी में से बैक्रेय शरीरी हुवा, प्रथम समय में सर्व बंध हुवा है भावार्थ
फीर देश बंध करके वहां से चवकर वनस्पत्यादिक उदारिक शरीर में रहे फीर वैकेय शरीर में उत्पन्न होवे इस अपेक्षा मे अनंत काल कहा. ऐसे ही देश वंधका अंतर जघन्य एक समय उत्कृष्ट अनंत काल जानना. वायुकायिक वैक्रेय शरीर प्रयोग बंध में से सर्वबंध का अंतर जघन्य अंतर्मुहूर्न उत्कृष्ट पल्योपम के असंख्यातवे भाग. क्यों कि वायुकायिक उदारिक शरीरी जीव वैक्रेय शरीर को प्राप्त हुवा वहां से पहिले समय में सर्व बंध होकर काल कर गया और पुनः वहां ही उत्पन्न हुवा परंतु जहां लग अपर्याप्ता- a. वस्था पूर्ण नहीं हुई है वहां लग वैक्रेय शरीर प्राप्त नहीं कर सकता और पर्याप्त हुवे पीछे पहिले समय में सर्व बंध हुवा इस से अपर्याप्त अवस्था का अंतर्मुहूर्त काल का अंतरा हुवा. उत्कृष्ट में वायुकायिक उदारिक
शरीरी वैक्रेय को प्राप्त हुवा वहां पाहिले समय में सर्व बंधक हुवा फीर देश बंधक होकर काल कर गया 25 फीर उदारिक शरीरी वायु में रहकर पल्पोपम के असंख्यातवे भाग में अवस्य वैक्रेय करे ऐसे ही देश मुबंध का अंतर मानना. तिथंच पंचेन्द्रिय बैक्रेय शरीर प्रयोग बंध में से सर्व बंध का अंतर जघन्य
पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 4.80
socid आठवा शतक का