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भावार्थ
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी :
उक्कोसेणं अणंतंकालं जाव आवलियाए असंखेज्जइभागो, जहा पुढविकाइयाणं, एवं वणस्सइकाइयवजाणं जाव मणुस्साणं वणस्सइकाइयाणं दोखुडाइं एवंचव उक्कोसेणं असंखेजं कालं असंखेज्जाओ ओसप्पिणी उसप्पिणीओ कालओ, खेत्तओ असंखेज्जा लोगा, एवं देसबंधंतरंपि, उक्कोसेणं पुढविकालो ॥ एएसिणं भंते ! जीवाणं
ओरालिय सरीर देसबंधगाणय सव्वबंधगाणय अबंधगाणय कयरे २ जाव विसेसाहिया वहां सर्व बंध समयांतर देश वंध रहा सर्व बंध समयाधिक क्षुल्लक भव ग्रहण यह देश वंध देश बंधका परस्पर अंतर जानना ] उत्कृष्ट अनंत काल यावत् आवलिकां का असंख्यात वा
उक्त अनुसार जानना. जैसे पृथ्वी काया का कहा वैसे ही वनस्पति काय छोड कर अन्य सब मनुष्य पर्यंत कहना. वनस्पति काया का सर्वबंध का अंतर जघन्य तीन समय कम दो क्षुल्लक भव (वनस्पतिकायिक तीन समय विग्रह से उत्पन्न होवे विग्रह के दो समय अनाहारक तीसरे समय सर्व बंधक हो कर क्षुल्लक जीव को फीर पृथिव्यादिक में क्षुल्लक भव रहकर फीर विग्रह वनस्पति काय में उत्पन्न हो। कर प्रथम समय सर्व बंधक रहे ऐसे सर्व बंधक और सर्व बंधका तीन समय कम दो क्षुल्लक भव ब्रहण अंतर होता है.) और उत्कृष्ट में असंख्यात काल. यह पृथिव्यादि. की कायस्थिति काल जानना. असंख्यात अवसर्पिणी उत्सर्पिणी काल से क्षेत्र से असंख्यात लोक जैसे पृथ्वीकाया का देश
.भकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी*