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शब्दार्थ
भावार्थ
478 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
जघन्य ए० एक समय उ० उत्कृष्ट ति तीन पल्योपम सा समय ऊणा ॥ १४ ॥ ओ० उदारिक शरीर प्रयोग बं० बंध का अं०आंतरा भं० भगवन् का काल से के० कितना हो० होबे गो० गौतम स सर्व बंध
उक्कोसेणं तिण्णि पलिओवमाई समय ऊणाइं ॥ १४ ॥ ओरालिय सरीरप्पओग १९७५ बंधतरेणं भंते ! कालआ केचिरं होई ? गोयमा ! सव्वबंधंतरं जहण्णेणं खुड्डाग
भवग्गहणं तिसमयऊणं, उक्कोसेण तेत्तीस सागरोवमाइं ठिई पुव्वकोडिसमया समय कम क्षुद्रक भव ग्रहण करना और उत्कृष्ट स्थिति में एक समय कम जिनको जितनी स्थिति होवे उतनी जानना. जिनको वैकेय शरीर है उन को देशबंध जघन्य एक समय उत्कृष्ट जिन को जितनी स्थिति है उन में एक समय कम करना ॥ १४ ॥ अब आंतरा कहते हैं. अहो भगवन् ! उदारिक शरीर प्रयोग बंध का आंतरा कितने काल का कहा ? अहो गौतम ! म बंध का आंतरा जघन्य तीन समय कम . क्षुद्रक भव (तीन समय तक विग्रह गति करके उदारिक शरीर में जब आता है तब दो समय तक अनाहारक रहकर तीसरे समय में सर्द बंधक क्षुल्लक भव में रहकर वहां से फीर मरकर उदारिक शरीर में उत्पन्न हुवा इस आश्री) उत्कृष्ट तेत्तीस सागरोपम और एक समय अधिक क्रोड पूर्व का अंतर होता है. " (कोई जीव मनुष्य गति में विग्रह गति से आया वहां प्रथम समय में ही सर्व बंधक होकर और पूर्व क्रोड का आयुष्य भोगव कर सातवी नरक में उत्पन्न होकर तीन समय की विग्रह गति से उदारिक शरीरी।
838 आठवां शतकका नववा उद्देशा 8888