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सत्र
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 880
रह प० परिषद स० समवर्तते हैं पं० पांच आ. अनुक्रम से च. चर्या से० शैय्या क. वध रो रोग त० तृण स्पर्श ज० जलमेल ए० अग्यारह वे वेदनीय में दं० दर्शन मोहनीय में ए. एक दं० दर्शन परिषह च० चारित्र मोहनीय में क० कितने परिषह स० समवर्तते हैं गो. गौतम स० सात परिषह अ. अरति अ० अचेल इ. स्त्री नि० निषिद्या जा० याचना अ० आक्रोश स० सत्कार पुरस्कार अं० अंतराय पंचेव आणुपुव्वी चरिया, सेजा,वहेय, रोगेय, तणफास, जल्लमेवय, एक्कारसवेयाणिजमि (१) सण मोहणिजेणं भंते ! कम्मे कइ परीसहा समोयरंति ? गोयमा ! एगे दसण परीसहे समोयरइ ।। चरित्त मोहणिजेणं भंते ! कइ परीसहा समोयरंति ?
गोयमा ! सत्तपरीसहा समोयरंति, तंजहा-अरई अचेल इत्थी, निसीहिया जायणा अंतराय ऐसी चार कर्म. प्रकृतियों मे २२ परिषह उदय में आते हैं. अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय के कितने परिषह हैं ? अहो गौतम ! ज्ञानावरणीय के दो परिषद हैं. १ प्रज्ञा व २ अज्ञान. अहो भगवन् !
वेदनीय कर्म से कितने परिसह का उदय होता है ? अहो गौतम ! अग्यारह परिषहों का उदय होता ११ क्षुधा १ तृषा ३ शीत ४ ऊष्ण ५ दंश मशक ६ चर्या ७ शैय्या ८ वध ९ रोग १० तृणस्पर्श व १११ जलमेल. अहो भगवन् ! दर्शन मोहनीय कर्म के कितने परिषह होते हैं ? अहो गौतम ! दर मोहनीय का मात्र एक दर्शन परिषह. और चारित्र मोहनीय के सात परिषह १ अरति २ अचेल ३
आठवा शतकका आठवा उद्देशा
भावार्थ
कोन