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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
{देव बांधे दे० देवी बं० बांधे सरल शब्दार्थ ॥१-१०-११॥ क० कितने भ० भगवन् प० परिषद प मरूपे गो० गौतम वा० बाइस प० परिषद प० प्ररूपे दि० क्षुधा परिषह पि० तृषा परिषह जा० यावत् अपज्जवसिय बंधइ ॥ तं भंते ! किं देसेणं देसं बंधइ, एवं जहेव इरियावहिय बंधगस्स जाव सव्वेणं सव्वं बंधइ॥ १० ॥ कइणं भंते! कम्म पगडीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अटुकम्म पगडीओ, पण्णत्ताओ, तंजहा - णाणावरणिजं जाव अंतराइयं ॥ ११ ॥ कइणं भंते ! परीसहा पं० ? गोयमा ! बावीसं परीसहा पण्णत्ता, तजहा -दिगिंच्छा परीसहे, पिवासापरीस हे बंध कर पुनः उपशांत मोह व क्षीण मोहवाला होवे इस अपेक्षा से सादि सांत है, अनादि काल से सांपरा{यिक बंध किया, आगे क्षीण कषायी होने से बंध नहीं करेंगे इस से अनादि सांत है, अभव्य जीव (आश्री अनादि अनंत है, ऐसे तीन भांगे पाते हैं परंतु सादि अनंत भांगा नहीं मीलता है. अहो भगवन् ! (सांपरायिक क्रिया का बंध आत्मा के देश से व कर्म के देश से होता है, आत्मा के देश से व कर्म के सर्वाशि मे होता है, आत्मा के सर्वाशि से व कर्म के देश से होता है अथवा कर्म के सर्वाशि से व आत्मा के सर्वांश होता है ? अहो गौतम ! प्रथम के तीन भांगे शून्य हैं मात्र चौथा भांगा पाता है || १० || अब कर्म आश्री प्रश्न करते हैं ? अहो भगवन् ! कर्म प्रकृतियों कितनी कहीं ? अहो गौतम ! आठ कर्म ( प्रकृतियों कहीं ? ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम, गौत्र व अंतराय ॥ १२ ॥
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<१० 4 आठना शतकका आठवा उद्देशा
११ पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र
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