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क-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋषिजी.
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भावार्थ
देसं बंधइ, सब्वेणं सव्वं बंधइ ? गोयमा ! णो देसेणं देसं बंधइ, णो देसेणं सव्वं बंधइ, णो सव्वेणं देसं बंधइ, सवेणं सव्वं बंधइ ।। ९ ॥ संपराइयाणं भंते ! किं णेरइओ बंधइ, तिरिक्खजोणिओ बंधइ, जाव देवी बंधइ ? गोयमा ! णेरइओ
बंधइ, तिरिक्खजोणिओ बंधइ, तिरिक्खजोणिणीवि बंधइ, मणुस्सोवि बंधइ, है मणुस्सीवि बंधइ, देवोवि बंधइ देवीवि बंधइ ॥ तं भंते ! किं इत्थी बंधइ, पुरिसो
बंधइ, तहेव जाव णो इत्थी णो पुरिसो णो णपुंसओ बंधइ ? गोयमा ! इत्थीवि १३ आदि रहित व अंत सहित या ४ आदि व अंत रहित है ? अहो गौतम ! आदि सहित व अंत सहित यह प्रथम भांगा पाता है शेष तीन भांगे नहीं पाते हैं. अहो भगवन् ! यह ईर्यापथिक बंध कर्म के देशांश व जीव के देशांश से होता है, २जीव के देशांश व कर्म के सर्वाश से होता है, ३ जीव के सर्वांश व कर्म के देशांश से होता हैं, या ४ जीव के सर्वाश व कर्म के सर्वाश से होता है ? अहो गौतम ! पहिले तीन भांगे नहीं पाते हैं मात्र जीव के सर्वाश व कर्म के सर्वाश से ईर्यापथिक बंध होता है. यह ईर्यापथिक बंध का अधिकार कहा. ॥ ९ ॥ अहो भगवन् ! सांपरायिक क्रिया क्ण नारकी बांधते हैं. ईतिर्यच वांधते हैं. तीर्यचणी बांधती हैं मनुष्य बांधते हैं मनुष्यणी बांधती हैं, देव वांधते हैं या देवी वांधती हैं ? अहो गौतम ! सातों ही सांपरायिक कर्मबंध करते हैं अर्थात् जितने सकषायी हैं वे सब सांपरायिक
* प्रगाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *