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धब्दार्थ १०व० व्यवहार प० रखे जो नहीं त• तहां धा धारणा सि होवे ज० जैसे त. तहां जी जीत मे व०व्यव
धारणा सिया धारणाए बवहारं पटवेजा, णोय से तत्थ धारणा सिया जहा से तत्थ
जीए सिया जीएणं ववहार पट्टवेजा, इच्चेएहि पंचाहिँ ववहारं पट्टवेज्जा,तंजहाआगमेणं,
ज्ञानी की पास करना, केवलज्ञानी की अविद्यमान अवस्था में मनःपर्यव ज्ञानी की पास आलोचनादि भावार्थ
करना, मनःपर्यव ज्ञानी के अभाव में अबाधिज्ञानी, अवधिज्ञानी के अभाव में चौदह पूर्वधर व चौदह पूर्वधर के अभाव में दश पूर्वधर की पास आलोचना करना जब कोई केवलज्ञानी की पास आलोचना ग्रहण करने को जावे तो वे उसे कहे कि तुम तुमारा सब अतिचार कहो. इतना कहनेपरभी यदि वह 2 माया से अपना आतिचार गोपवे तो उसे पायीच्छत्त देवे नहीं, परंतु कोई आलोचना करते भूल जावे
और माया से अपना दोष गोपवे नहीं ऐसा पुरुष को केवलज्ञानी उनका अतिचार कहे और प्रायच्छित्त देवे. जैसे केवलज्ञानी जानते हैं वैसे ही उपयोग से अवधि, मनःपर्यव ज्ञानी चौदह पूर्वधर दश पूर्वधर जानते हैं. वेभी माया से गोपनेवाले का दोष प्रगट करे नहीं परंतु भूलजाने से माया रहित जानने से
उन को उन का अतिचार प्रगट करे. लज्जा से क्वचित् पाप को छिपावे तो मिष्ट वचन से उन को * समजावे कि अहो मुने ! अंतःकरण में रहा हुचा शल्य भवोभव में महा दुःख रूप फल के दाता है..
तुम को धन्य है कि उस शल्य का उद्धार के लिये तुम रुज्ज हुवे हो, ऐसा अवसर पुनः प्राप्त होना कठिन
१.१-१२ पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र
40393> आठवा शतकका आठवा उद्देशा 988