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________________ शब्दार्थ | सूत्र भावार्थ 48 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी जा० यावत् उ० उद्वेग उपजाते ति० त्रिविध ति० त्रिविध से अ० असंयत अ० अविरत जा० यावत् ए० एकान्त बा० बाल भ० होते हो ॥ ५ ॥ त० तब ते ० वे अ० अन्यतीर्थिक थे० स्थविर भ० भगवन्त को ए० ऐसा व० बोले तु० तुम अ० आर्य ग० जाते अ० नहीं गये वी० व्यतिक्रमते अ० नहीं व्यतिक्रमा रा० राजगृह न० नगर को सं० प्राप्त करने की का० इच्छा वाले अ० नहीं प्राप्त हुवे त० तब ते० वे थे० केणं कारणेणं अज्जो ! अम्हे तिविहं तिविहेणं एगंत बालायाचि भवामो? तएणं ते थेरा भगवंतो उत्थि एवं वयासी तुज्झेणं अज्जो ! रीयं रीयमाणा पुढविं पेवेह जाव उवदवेह तणं तुझे पुढविं पेच्चैमाणा जाव उवदवेमाणा तिविहं तिविहेणं जाव एगंत बालायावि भवह ॥ ५ ॥ तरणं ते अण्णउत्थिया थेरे भगवंते एवं वयासी तुज्झेणं अजो ! गममाणे अगए वीइक्कमिजमाणे अवीइकंते रायगिहं नगरं संपाविकामे असं पत्ते, तणं ते थेरा भगवंतो ते अण्णउत्थिए एवं वयासी - नो खलु अजो ! अम्हे तीन योग से असंयति अविरति यावत् एकान्त वाल हैं स्थविरोंने उत्तर दिया कि अहो आर्यो ! तुम्हारे ही अभिप्राय से तुम पृथ्वीकायिक जीवों की हिंसा करते हो यावत् उद्वेग उपजाते हो ॥ ५ ॥ पुनः अन्यतीर्थिक तीसरा प्रश्न करते हैं. अहो आर्यो ! जाते हुए नहीं गये, व्यतिक्रमते हुवे नहीं व्यतिक्रमे. और राजगृह नगर को प्राप्त होने की इच्छावाले प्राप्त नहीं हुवे ऐसा तुम मानते हो तब स्थविर भगवन्तने प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ११२२
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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