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शब्द
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अविरत मा० यावत् ए० एकान्त वा० अज्ञान भ० होते हो ॥४॥ त० तब ते वे अ. अन्यतीर्थिक थे
भवह ॥ तएणं ते अण्णउत्थिया तेथेरे भगवंते एवं वयासी केणं कारणेणं अजो! अम्हे तिविहं जाव एगंत बालायावि भवामो ? तएणं ते थेरा भगवंतो ते अण्णउत्थिए एवं वयासी तुज्झेणं अजो! अदिण्णं गिण्हह ३ तएणं तुझे आदण्णं गेण्हमाणा जाव एगंत बालायावि भवह ॥ तएणं ते अण्णउत्थिया ते थेरे भगवंते एवं वयासी केणं कारणणं अजो ! अम्हे अदिण्णं गिण्हामो जाव एगंतबालायावि भवामो ? तएणं ते थेरा भगवंतोते अण्णउत्थिए एवं वयासी तुज्झेणं अज्जो दिजमाणे अदिण्णे तं चेव जाव गाहा
वइरसणं तं नो खलु तं तएणं तुझे अदिण्णं गिण्हह तंचेव जाव एगंत बालायावि अदत्त ग्रहण करते हैं यावत् एकान्त बाल हैं ? स्थविर भगवंतने उत्तर दिया कि अहो आर्यो ! तुम्हारे ही अभिप्राय से देने लगे को नहीं दिया कहते हो लेने लगे को नहीं लीया व पात्र में डालने लगे को नहीं डाला कहते हो और भी कोई आहारादि डालने लगा और पात्र में डालते पहिले कोई पुरुष उस आहार को लेजावे तो गृहस्थ का आहार गया परंतु साधु का नहीं गया ऐसा तुम कहते हो इस से तुम अदत्त ग्रहण
करते हो, भोगते हो व आस्वादते हो और इस तरह ग्रहण करते यावत् आस्वादते असंयति अविरति 12 यावत् एकान्त बाल होते हो ॥ ४ ॥ अन्यतीर्थिक पुनः प्रश्न करते हैं कि आर्यो ! तुम तीन करन तीन
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र
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भावारी
आठना शतकका सातवा उद्देशा *84980