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________________ - शब्दाथ। 80% 48 पंचमांग विवाह पण्णति ( भगवती) सूत्र एकान्त नि. निजरी क०करे न० नहीं है सें. उन को पा० पाप कर्म क० करे ॥१॥ स श्रमणोपासक मं. भगवन् त०तथारूप सश्रमण मा०माहण को अ०अफासुक अ०अशुद्ध अ०अशन पा०पान खाखादिम 0 सा० स्वादिम १० देता किं. क्या क. करे गो. गौतम ब. बहुत से वह नि. निर्जरा क. करे अ० अल्प से वह पा. पापकर्म का करे ॥ २ ॥ स० श्रमणोपासक भ० भगवन् त. तथारूप अ. असंयति कजइ, नत्थिय से पावे कम्मे कज्जइ ॥ १ ॥ समणोवासगरसणं भंते ! तहारूवं समणंवा माहणंवा अफासुएणं अणेसणिजेणं असण पाण खाइम साइमेणं पडिलाभेमाणस्स किं कज्जइ ? गोयमा ! बहुतरिया से निजरा कज्जइ अप्पतराए से पावे कम्मे कजइ ॥ २ ॥ समणोवासगस्सणं भंते ! तहारूवं असंजय, अविरय, अपकहते हैं. अहो भगवन् ! तथारूप श्रमण माहण को फासुक एषणिक अशन, पान, खादिम, व स्वादिम देनेवाले श्रावक को क्या फल होवे ? अहो गौतम ! वह एकान्त निर्जरा करता है. किंचिन्मात्र पापकर्म नहीं करता है ॥१॥ अहो भगवन् ! तथारूप श्रमण माहण को अफासुक अनेषणिक अशन, पान, ई खादिम स्वादिम देनेवाले श्रावक को क्या फल होता है ? अहो गौतम ! उन को पाप कर्म की अपेक्षासे बहत निर्जरा होती है और निर्जरा की अपेक्षा से अल्प पाप कर्म+लगता है॥२॥ अहो भगवन् ! असंयनि, ___ + किसी रोगादि कारन से संयमी को संयम का उपष्टंभ के लिये सचित्त सदोष आहार देते हैं इस से संयमी आठवां शतकका छठा उद्देशा84862
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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