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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
48 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
{कातरिक इ० ये दु० द्वादश आ० आजीविक उ० उपासक अ० अर्हन् दे० देवता अ० माता पिताकी सु० सुश्रूषा करनेवाले पं० पांच फल १० निवर्ते उ० गुलर ० वड बो० बोर स० अंजीर वृक्ष पि० पलिंख वृक्ष पं० पंडाल ल० लहसण कं० कंदमूल वि० रहित अ० खसी करे नहीं अ० छेदे नहीं गो० वृषभ त० इस प्राण वि० वर्जित वि० वित्त से वि० वृत्ति क० करते वि० विचरते हैं ए० ये ता० तावत् ए० ऐसा भवंति तं जहा-ताले, तालपलंबे, उन्विहे, संविहे, अवविहे, उदए, नामुदए नमुदए, अणुवालए, संखवालए, अयंपुले, कायरिए, इचए दुबालस आजीवियोवासगा अरहंतदेवयागा, अम्मा पिउ सुस्सूसगा; पंचफलपडिक्कता तं० उउंबरेहिं,
4949> आठवा शतक का पांचवा उद्देशा 80
डेहिं
बोरे हिं, सतरेहिं, पिलक्खुहिं, १लंडूल्हसुण कंदमूलविवज्जगा; अणिलंछिएहिं, अणक आहार करे और इसी प्रकार का उपदेश करते हैं, जैसे आनंदादि श्रावक हैं वैसे ही गौशालक के बारह श्रावक कहे हैं जिन के नाम. १ ताल २ तालमलब ३ उबिह ४ संविह ५ अविविध ६ उदक ७ नामुदक ८ नमुदक ९ अनुशलक १० शंखपालक ११ अयंपुल व १२ कातरिक. उक्त श्रावकों गोशालक को ही अरिहंत देव करके मानते हैं मातपिता की सुश्रुषा करते हैं, गूलर, वड, बोर, अंजीर व पिलंखु
{इन पांच प्रकार के फल का भक्षण नहीं करते हैं, पिंडाल, ल्हसन आदि कंदमूल का भक्षण नहीं करते हैं। बैलों को निलंछन (खसी ) नहीं कराते हैं, वैसे ही बैलों के नाक कान का छेद नहीं कराते हैं और
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