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1% अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
ओहिनाणी रूविदव्वाइं जाणइ पासइ; जहा नंदीए जाव भावओ ॥ मणपज्जवनाण स्सण भंते ! केवइए विसए प. ? गोयमा ! से समासओ चउविहे प० तंजहा दव्वओ खत्तओ कालओ, भावओ, दव्वओणं उजुमई अणते अणंतपएसिए जहा नंदीए, जाव भावओ ॥ केवल नाणसणं भंते ! केवइए विसए ५० ? गोयमा ! से समासओ चउविहे प० तंजहा दव्वओ, खत्तओ, कालओ, भावओ ॥ दवओ केवलनाणी सव्वदव्वाइं जाणइ पासइ, एवं जाव भावओ ॥ मइ अण्णाणस्सणं
भंते ! केवइए विसए ५० ? गोयमा ! चउविहे प० तंजहा दवओ जाव देखे, क्षेत्र से जघन्य अंगुल का असंख्यातवा भाग जाने देखे, उत्कृष्ट संपूर्ण लोक व अलोक में लोक जितने असंख्यात खंड होवे तो जाने देख. काल से जघन्य आवलिका का असंख्यातवा भाग उत्कृष्ट असंख्याती अवसर्पिणी उत्सर्पिणी. भाव से अनंताभाव जाने देखे. इत्यादि सब नंदोस्त्रानुसार जानना. मनःपर्यव ज्ञान के चार भेद द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव. द्रव्य से संज्ञी के मन के भाव जाने दख, क्षेत्र में दो भेद ऋजुमति और विपुलमति. ऋजुमति अढाइ अंगूल कम अढाई द्वीप जाने दखे, विपुलमति संपूर्ण अढाइ द्वीप जाने देखे, काल से पल्योपम के असंख्यातवे भाग से अतीत अनागत काल की बात जाने देखे, भाव से केवल ज्ञान के अनंतवे भाग जाने देखे. केवल ज्ञान के द्रव्यादि चार भेद. केवलज्ञानी
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादमी *
भावार्थ