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ओहिनाणी; जे चउनाणी ते आभिणिबोहियणाणी जाव मणपज्जवणाणी, जे अण्णाणी ते नियमा तिअ अण्णाणी तंजहा मइअण्णाणी सुयअण्णाणी, विभंगनाणी, केवलदसण अणागारोवउत्ता जहा केवलणाण लधिया ॥ १९ ॥ सजोगीणं भंते ! जीवा किंणाणी अण्णाणी ? जहा सकाइया, एवं मणजोगी वयजोगीवि, कायजोगीवि, अजोगी जहा सिद्धा ॥ २० ॥ सलेस्साणं भंते ! जीवा किं गाणी ? जहा सकाइया । किण्हलेस्साणं भंते ! जहा सकाइया सइंदिया, एवं जाब पम्हलेस्सा, सुक्कलेसग जहा सलेस्सा ॥ अलेस्सा जहा सिद्धा ॥ २१ ॥ सकसाइयाणं भंते !
जहा सइंदिया एवं जाव लोह कसाइयाणं । अकसाइयाणं भंते ! किंणाणी अण्णाणी ? भावार्थE अचक्षु दर्शन अनाकारोपयुक्त में चार ज्ञान तीन अज्ञान की भजना. अवधिदर्शन अनाकारोपयुक्त में
चार ज्ञान की भजना तीन अज्ञान की नियमा केवलदर्शन में केवल ज्ञान की नियमा ॥ १९ ॥ सजोगी
मन जोगी वचन जोगी व कायजोगी में सकायिक की तरह पांच ज्ञान तीन अज्ञान की भजना. अजोग 26 में केवल ज्ञान की नियमा ॥ २० ॥ सलेशी में पांच ज्ञान तीन अज्ञान की भजना कृष्ण, नील, कापोत,
तेजो व पद्मलेशीवाले में चार ज्ञान तीन अज्ञान की भजना शुक्ललेशी में पांच ज्ञान तीन अज्ञान की भजना
48 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र
आठवा शतक का दूसरा उद्देशा
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