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पंचमान विवाह पण्णात्त (भमवती) सूत्र 488
नाणवजाइं चत्तारि नाणाइं तिण्णि अग्णाणाई भयणाए । सामाइय चरित्तलडियाणं भंते ! जीवा किंणाणी अण्णाणी ? गोयमा ! चत्तारि नागाइं भयगाए, तस्स अलद्धियाणं पंच नाणाई तिण्णिय अण्णाणाई भयणाए, एवं जहा सामाइय चरित्त. लद्धिया अलद्धियाय भणिया एवं जाव अहक्खाय चरितलद्धिया अलाइयाय भाणि. यव्वा, नवरं अहक्खाय चरित्तलद्धियाणं पंच नाणाई भयणाए, चरित्ताचरित्तलद्धियाणं भंते ! जीवा किंणाणी अण्णाणी ? गोयमा ! नाणी नो अण्णाणी, अत्यंग इया दुनाणी, अत्थेगइया तिण्णाणी, जे दुनाणी, ते आभिणिबोहियनाणी, सुयनाणीय
जे तिण्णाणी ते आभिणिबाहिय नाणी सुयनाणी ओहिनाणीय । तस्स अलद्धियाणं दानलब्धि, लाभलब्धि, भोगलब्धि, उपभोगलब्धि व वीर्यलब्धि में पांच ज्ञान तीन अज्ञान की भजना. उस के अलद्धिये में केवल ज्ञान की नियमा. बालवीर्यलब्धि असंयति ज्ञानी व अज्ञानी दोनों को हो
से उस में तीन ज्ञान तीन अज्ञान की भजना, इस के अलद्धिये में पांचों ज्ञान की भजना. पंडित वीर्य के लद्धिया में पांच ज्ञान की भजना उस के अलद्धिया में मनःपर्यव ज्ञान सिवाय चार ज्ञान तीन अज्ञान की भजना. बाल पंडित वीर्य में लीन ज्ञान की भजना इस के अलडिया में पांच ज्ञान तीन अज्ञान की भजना.
आठवा शतकका दूसरा उद्देशा
भाव