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विवाह पण्णत्ति (भगवती ) मूत्र oggods
अभवसिद्धियाणं पुच्छा ? गोयमा ! नो नाणी अण्णाणी, तिण्णि अण्णाणाई भयणाए । नो भवसिद्धिया नो अभवसिद्धियाणं जीवा जहा सिद्धा॥१६॥सण्णीणं पुच्छा? जहा सइंदिया, अण्णी जहा बेइंदिया, नो सण्णी नो असण्णी जहा सिद्धा ॥१७॥ कइविहाणं भंते ! लद्धी १० गोयमा ! दसविहा लडी ५० तंजहा-नाणलडी, दसणलद्धी, चरित्तलद्धी, चरित्ताचरित्तलद्धी, दाणलही, लाभलडी, भोगलही,
उवभोगलद्धी, वीरियलडी, इंदियलडी ॥ णाणलहीणं भंते ! कतिविहा प. ? व अज्ञानी दोनों हैं. भवसिद्धिक में पांच ज्ञान की भजना है और जहांलग सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं हुई है वहांलग तीन अज्ञान की भजता है. अश्वसिद्धिक में ज्ञान नहीं हैं परंतु तीन अज्ञान की भजना है. नो भवसिद्धिक नो अभवसिद्धि कमें केवल ज्ञानकी नियमाई ॥१६॥अब संज्ञी द्वार कहते हैं. संझी में चार ज्ञान तीन अज्ञान की भजना. असंज्ञी में पर्याप्त अवस्था में दो अज्ञान की नियमा और अपर्याप्त अवस्था में दो ज्ञान की नियमा है. नो संझी नो असंज्ञी में कवल ज्ञान की नियमा है ॥ १७॥ अहो भगवन् ! लब्धि कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम! कर्म क्षय से आत्मा को ज्ञानादि गुण की प्राप्ति सो लब्धि. उन दश भेद कहे हैं. १ ज्ञान लब्धि २ रुचिरूप आत्मपरिणाम से दर्शन सामान्यावबोध की प्राप्ति सो दर्श लिब्धि, ३ चारित्र लब्धि ४ चारित्राचारित्र लब्धि ५ दान लब्धि ६ लाभ लब्धि ७ भोग लब्धि ८ उप
*32*2 आठवा शतक का दूसरा उद्देशा
भावार्थ
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