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भावार्थ
.98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 488
विकाइया, बेइंदिय तेइंदिय चउरिंदियाणं दो णाणाइ दो अण्णाणाइ नियमा। पंचिंदिया जहा सइंदिया । अणिंदियाणं भंते ! जीवा किं णाणी अण्णाणी ? जहासिद्धा॥११॥ सकाइयाणं भंते ! जीवा किं णाणी अण्णाणी ? गोयमा ! पंच णाणाइं तिण्णि अण्णाणाई भयणाए । पुढविकाइया जाव वणस्सइ काइया नो णाणी, अण्णाणी, नियमा दुअण्णाणी तं. मइअण्णाणी सुयअण्णाणी ॥ तसकाइया जहा सकाइया,
अकाइयाणं भंते ! जीवा किण्णाणी ? जहा सिहा ॥ १२ ॥ सुहुमाणं भंते ! को दो अज्ञान की नियमा है क्यों कि वहां मिथ्यादृष्टि उत्पन्न होते हैं. बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय को दो ज्ञान दो अज्ञान की नियमा है. क्योंकि उन को अपर्याप्तावस्था में शाश्वादान सम्यक्त होता है."
इस से दो ज्ञान होवे परंतु पर्याप्त हुवे पीछे सम्यक्त्व का नाश होता है इस से दो अज्ञान रहता है. पंचे-38 केन्द्रिय में चार ज्ञान तीन अज्ञान की भजना. और अनिन्द्रिय में केवल ज्ञान की नियमा ॥ ११॥ अब
कायद्वार कहते हैं. सकायिक जीव में पांच ज्ञान व तीन अज्ञान की भजना है क्योंकि केवल ज्ञानी भी सकायिक होते हैं, पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेउकायिक, वायुकायिक, व वनस्पतिकायिक में दो अज्ञान की नियमा है. इन में ज्ञान नहीं होता है. उसकायिक में पांच ज्ञान व तीन अज्ञान की भजना है. अकायिक में केवल ज्ञान की नियमा है ॥ १२ ॥ अव सूक्ष्म द्वार कहते हैं. अहो भगवन् ! क्या है।
आठवा शतक का दूसरा उद्देशा