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________________ शब्दार्थ | पं० पांचप्रकारका आ० मति ज्ञान सु० श्रुतज्ञान ओ० अवधि ज्ञान म० मनःपर्यव ज्ञान के० केवल ज्ञान से० वह केसे आ० मतिज्ञान च० चारप्रकारका उ० अवग्रह ई० ईहा अ० अवाय धा० धारणा ए ऐसे रा० रायप्रसेणी में जो० जो ना० ज्ञान के भे० भेद त० तैसे इव्यहां भा० कहना जा० यावत् के० केवलज्ञान ॥ ६ ॥ अ० अज्ञान मं० भगवन् कः कितनाप्रकारका गो० गौतम ति० तीन तंजा - आभिणित्रोहियनाणे, सुयनाणे, ओहिनाणे, मणपज्जवनाणे, केवलनाणे || से किं तं आभिणिबोहिय नाणे ? आभिणिबोहियनाणे चउव्विहे प० तंजहाउग्गहे. ईहा, अवाय, धारणा एवं जहा रायप्पसेणीए, जो नाणाणं भेओ तहेव इह भाणियव्वो, जाव से त्तं केवल नाणे ॥ ६ ॥ अण्णाणेणं भंते ! कइविहे पण्णत्ते ? अहो भगवन् ! ज्ञान के कितने भेद कहे ? अहो गौतम ! ज्ञान के पांच भेद कहे हैं. १ मति ज्ञान १२ श्रुत ज्ञान, ३ अवधि ज्ञान, ४ मनःपर्यंत्र ज्ञान और ८ केवल ज्ञान आभिनिवोधिक (मति ) ज्ञान क्या { है ? मति ज्ञान के चार भेद कहे हैं ? अवग्रह सो सामान्यपना से वस्तु को ग्रहण करना २ ईहा सो ( ग्रहण किये हुवे को विचारना ३ अवाय सो ग्रहण किये हुवे को निश्चित करना और ४ धारमा उक्त ग्रहण किये हुवे को घार कर रखना. इन में अवग्रह के दो भेद अर्थावग्रह व व्यंजनावग्रह इत्यादि पांचों ज्ञान का कथन रायप्रसेणी सूत्र से जानना || ६ || अहो भगवन् ! अज्ञानके कितने भेद कहे हैं ? अहो 6 भावार्थ els 49 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी ! * प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * १०४०
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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