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भावार्थ
408 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋाजी
* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
गोमा ! सोहम्म कप्पोवग वैमाणिय देव कम्मासीविसेवि जाव सहस्सार कप्पोवग मणिय देव कम्मासीविसेवि, नो आणय कप्पोवरा वैमाणिय देव कम्मासीविसे. जाव नो अच्चुयकप्पोवग वेमाणिय देव कम्मासीविसे ॥ जइ सोहम्म कप्पव मणि देव कम्मासीविसे किं पज्जत्ता सोहम्मकप्पोवग जाव कम्मासीविसे अपज्जत्ता सोहम्म जाव कम्मासीविसे ? गोयमा ! नो पज्जन्त्ता सोहम्म कप्पोवग बेमाणिय देव कम्मासीविसे, अपजत्ता सोहम्म कप्पोवग वेमाणिय देव कम्मासीसे । एवं जाव नो पत्ता सहस्सार कप्पोवग वेमाणिय देव कम्मासीविसे, अपजत्ता सहस्सार कप्पोवग जाव कम्मासीविसे ॥ ४ ॥ दसट्टाणाई छउमत्थे सव्वभावेणं न जाणइ | कल्पोत्पन्न यावत् अच्युत कल्पोत्पन्न वैमानिक देव कर्माशीविष है ? अहो गौतम ! सौधर्म यावत् सहार { कल्पोत्पन्न कर्माशीविष है परंतु आणत, प्राणत, आरण व अच्युत कल्पोत्पन्न कर्माशीविष नहीं है. यदि सौधर्म कल्पोत्पन्न वैमानिक देव कर्म आशीविष है तो क्या पर्याप्त है या अपर्याप्त है ? अहो गौतम ( अपर्याप्त सौधर्म कल्पोत्पन्न वैमानिक देव कर्म आशीविष है परंतु पर्याप्त नहीं है. ऐसे ही सहस्रार तक में अपर्याप्त कल्पोत्पन्न वैमानिक देव कर्म आशीषिका जानना ॥४॥ छद्मस्थ सर्व भावसे दश स्थान को नहीं
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