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मुनि श्री अमोलक ऋषिजी अनुवादक-बालब्रह्मचारी
संजोएणं,उवउंजिऊणं जत्थ जइया संजोगातेसव्वे भाणियव्वा एएपुण जहानवमसए पवेसणए भणिहामि तहा उवजंजिऊण भाणियव्वा,जाव असंखजाअणता एवं चेव.णवरं एकपदं अब्भहियं जावअहवाअणंता परिमंडल संठाण परिणया जाव अणंता आययसंठाण परिणया, एएसिणं भंते ! पोग्गलाणं पओग परिणयाणं मीसापरिणयाणं, वीससा परिणयाणं
कयरे कयरेहिंतो जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! सव्वत्थोवा पोग्गला पयोग द्वि, त्रि, चतुष्क पांच भांगे होते हैं. इन में द्वि संयोगी चालीस भांगे होते हैं. त्रीसंयोगी साठ होते हैं चार संयोगी वीस और पांच संयोगी एक भांगा होता है. ऐसे पटकाया का कहना इस में छ संयोगी में आरंभ अनारंभ के छ बोल कहना, सप्त संयोगी में उदारिकादिकाय प्रयोग कहना. आठ संयोग में ध्यंतरादिक के भेद कहना नव संयोगी में नव ग्रैवेयक, दश संयोगी में दश भुवनपति, वारह संयोगी में कल्पोत्पन्न देव वगैरह नववे शतक के तेतीसवे उद्देशे में गंगेय अनगार के भांगे किये उसी अनुसार जानना असंख्यात नरकादिक के स्थान है वहां असंख्यात कहना अंतिम आयत परिमंडल संस्थान परिणत कहना. अब इस की अल्पाबहुत्व करते हैं अहो भगवन् प्रयोग मीश्र व वीसमा परिणत इन तीनों में,
कौन से पुद्गल कम ज्यादा यावत् विशेषाधिक हैं ? अहो गौतम । सब से थोडे प्रयोग परिणत कायादि * रूप पना से जीव पुद्गल संबंध कालका लोक पना होने से, इस से मात्र परिणत अनंत गुने कायादि
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायनी मालाप्रसाद जी *