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________________ 8288 गोयमा ! एगैदियं जाव परिणएवा पांचंदिय जाव परिणएवा ॥ जइ एगदिय जाव परिणए किं वाउकाइय एगिदिय जाव परिणए अहवा अवाउ काइय एगिदिय: जाव परिणए ? गोयमा ! वाउकाइय एगिदिय जाव परिणए, १०१९ नो अबाउ काइय जावः परिणए, एवं एएणं अभिलावेणं जहा ओगाहणा संठाण वेउब्विय सरीरं भणियं तहा इह भणियव्वं जाव पज्जत्ता सव्व सिद्ध अणुत्तरोवाइय कप्पातीय वैमाणियदेव पंचिंदिय वेउब्धिय सरीर काय प्पओग परिणएवा, अपजत्ता सव्व? सिद्ध अणुत्तरोक्वाइय जाव परिणए ॥ १६ ॥ जइ वेउब्विय मीसा सरीर कायप्पओग परिणए किं एगिदिय मीसा सरीर जाव भावार्थ केन्द्रिय प्रयोग परिणत है तो क्या वायु काय परिणत है या वायुकाय सिवाय अन्य काय प्रयोग परिणत है ?m अहो गौतम ! वायुकाय एकेन्द्रिय प्रयोग परिणत है. इसी आलापकसे पन्नवणा सूत्रके इक्कीसवे पदमें अवगाहना, संस्थान कहा वैसे ही यहां कहना. यावत् पर्याप्त अपर्याप्त सिद्ध अनुत्तरोपपातिक कल्पातीत * वैमानिक देव पंचेन्द्रिय वैक्रेय शरीर प्रयोग परिणत है. ॥ १६ ॥ जैसे वैक्रेय शरीर का कहा वैसे ही है। वैकेय मीश्र शरीर का जानना. परंतु इस में देव नारकी के अपर्याप्ता में वैक्रेय मीश्र शरीर हैं और पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 128 आठवा शतकका पहिला उद्देशा 981980
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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