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कायप्पओग परिणए, मणुस्सपंचिंदिय जाव परिणए? गोयमा! तिरिक्ख जोणिय जाव परिणए मणुस्स पंचिंदियजाव परिणए।जइ तिरिक्ख जोणिय जाव परिणए किं जलचर तिरिक्ख जोणिय जाव परिणए, थलचर खहयर जाव परिणए ? एवं चउक्कभेदो जाव खहयराणं||जइ मणुस्सपंचिंदिय जाव परिणए किं सम्मच्छिममणुस्स पंचिंदिय जाव परिणए गब्भवतिय मणुस्स जाव परिणए ? गोयमा ! दोसुवि ॥ जइगब्भवतिय मणुस्स जाव परिणए किं पजत्तग गन्भवतिय जाव परिणए अपजत्तग गम्भवकंतिय जाव
मा ! पज्जत्तग गब्भवतिय जाव परिणएवा, अपज्जत्तग गब्भवकंतिय जाव परिणएवा ॥ १४ ॥ जइ ओरालियमीसा सरीर कायप्पओग परिणए किं एगिभावार्थ: स्पतिकाय तक में चार २ भेद जानना. बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय में पर्याप्त अपर्याप्त ऐसे दो २
भेद जानना, यदि पंचेन्द्रिय उदारिक शरीर प्रयोग परिणत है तो क्या तिर्यंच पंचेन्द्रिय या मनुष्य उदारिक शरीर काय प्रयोग परिणत है ? अहो गौतम ! तिर्यंच पंचेन्द्रिय व मनुष्य दोनों प्रयोग परिणत है । है. तिर्यंच पंचेन्द्रिय में क्या जलचर, स्थलचर व खेचर परिणत है ? अहो गौतम ! उन सब में संमूछि व गर्भज पर्याप्त अपर्याप्त ऐसे चार २ भेद जानना. मनुष्य में भी संमूच्छिम, गर्भज के पर्याप्त व अपर्याप्त है।
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती).सूत्र
4234 साना सवक का पहिला
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