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१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
सुहुमाय,बादराय,पजत्तगाय,अपज्जत्तगाय भाणियव्वा ।बेइंदिय पओग परिणयाणं पुच्छा ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा- पजत्तग बेइंदिय पओग परिणया, अपजत्तग बेइंदिय पओग परिणयाय, एवं तेइंदिय पओग परिणयावि, एवं चरिंदिय पओग परिणयावि ॥ रयणप्पभा पुढवि गेरइय पंचिंदिय पओग परिणयाणं पुच्छा ? गोयमा! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-पजत्तग रयणप्पभा पुढवि णेरइय पंचिंदिय पओग परिणया, अपजत्तग रयणप्पभा पुढवि णेरइय पंचिंदिय पओग परिणया, एवं जाव अहे सत्तम पुढवि णेरइय पंचिंदिय पओग परिणया ॥ सम्मुच्छिम जलयर तिरिक्ख जोणिय पंचिं दिय पओग परिणयाणं पुच्छा ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता तंजहा-पजत्तग सम्मुच्छिम
जलयर तिरिक्ख जोणिय पंचिंदिय पओगपरिणया,अपज्जत्तग सम्मुच्छिम जलयर तिरिक्ख । अपर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय प्रयोग परिणत. ऐसे ही सूक्ष्म अप्काय, तेउकाय, बाउकार व वनस्पति के दो २ भेद जानना. पांचो स्थावर के दो २ भेद सूक्ष्म व बादर उन के भी दो २ भेद पर्याप्त व अपर्याप्त. बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय के दो दो भेद पर्याप्त व अपर्याप्त. रत्नममा यावत् तम-13 तमा पृथ्वी के दो भेद. पर्याप्त व अपर्याप्त रत्नप्रभा यावत् तमतमा पृथ्वी नारकी पंचेन्द्रिय प्रयोग परिणत.*
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादमी *
भावार्थ