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________________ शब्दार्थ । सूत्र भावार्थ 49- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्त (भगवती) सूत्र ० भगवन् अ० अचिश: कौनसे मं० भगवन् अ० अल्प कर्म वाला जा० यावत् अ० अल्पवेदना वाला पूर्ववत् ॥ १४ ॥ अ० है पो० पुद्गल भ० प्रकाशे उ० उद्योतकरे त० तपे प० प्रभाकरे ६० हां अ० है क० अ० अचिश पो० पुद्गल ओ० प्रकाशे का० कालोदायिन कु कुछ अ० अनगार की ते० तेजोलेश्या वाकायं समारंभइ, बहुतरायं वणस्सइकायं समारंभइ, बहुतरायं तसकायं समारंभइ, तत्थणं जे से पुरिसे अगणिकायं निव्वावेइ सेणं पुरिसे अप्पतरायं पुढविकार्य समारंभइ, अप्पतरायं आउकार्य समारंभइ, बहुतरायं तेउकायं समारंभइ, अप्पतरायं वाकायं समारंभइ, अप्पतरायं वणस्सइकार्य समारंभ इ. अप्पतरायं तसकायं समारंभइ, सेतेणें कालोदाई ! जाव अप्पवेयणातराएव ॥ १४ ॥ अस्थि भंते ! जीवों का समारंभ करता है और जो अनिकाय को बुझाता है वहपुरुष अल्प पृथ्वीकायिक अल्प अप्कायिक { बहुत तेङकायिक, अल्प वायु, वनस्पति व त्रस कायिक जीवों का आरंभ करता है. इसी से अहो कालो{दायिन् ! ऐसा कहा गया है किं अग्नि प्रदीप्त करनेवाला महाकर्मवाला यावत् महा वेदनावाला व अनि { बुझानेवाला अल्प कर्मवाला यावत् अल्प वेदनावाला होता है ||४|| अहो भगवन् ! जैसे सचित्त अशिकाय { प्रकाश करती है वैसे ही क्या अचित्त अशिकायके पुद्गलों प्रकाश करे, उद्यात करे, तपे ? हां कालोदायिन् 1 ॐ सातवा शतकका दशवा उद्देशा ९८७
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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