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भवगती )
शब्दार्थ यावत् आ० आकाशास्तिकाय तं तैसे जा. यावत् रू. रूपीकाया को अ० अजीवकाया ५० प्ररूपते ।
ago हैं से० वह क० कैसे गो० गौतम त० तब से वे भ० भगवन्त गो० गौतम ते उन अ० अन्यतीर्थिक
को एक ऐसा व० बोले नो० नहीं दे देवानप्रिय अ० अम्तिभाव को न० नास्ति त्ति ऐसा व कहते 00 हैं न० नास्तिभाव को अं० अस्ति ति ऐसा व० कहते हैं अ० हम दे० देवानुप्रिया स० सर्व अ०१७
पण्णवेइ, से कहमेयं गोयमा ! एवं ? तएणं से भगवं गोयमे ते अण्णउत्थियं ___ एवं वयासी नो खलु देवाणुप्पिया अत्थिभावं नत्थित्ति वयामो, नत्थिभावं अत्थिात्त.
वयामो, अम्हेणं देवाणुप्पिया! सव्वं अत्थित्तिभावं अत्थिवयामो, सव्वं नत्थिभावं नत्थित्तिवयामा, तं चेयसा खलु तुब्भे देवाणुप्पिया ! एयमढे सयमेव पच्चुवेक्खह
त्तिक? ॥ ते अण्णउत्थिया एवं वयासी जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भावार्थ
स्वामी की पास आये और बोले कि अहो गौतम ! तुम्हारे धर्माचार्य धर्मोपदेशक श्रमण ज्ञातपुत्र पांच
अस्तिकाय प्ररूपते हैं उन में चार अजीवकाय व एक जीवकाय वैसे ही चार अरूपीकाय व एक रूपी १० काय प्ररूपते हैं तो यह किस तरह है ? उस समय में भगवान् गौतमने उन अन्यतीर्थियों को ऐसा
कहा कि अहो देवानुप्रिय ! सब अस्तिभाव को हम अस्ति कहते हैं और सब नास्तिभाव को हम नास्ति कहते हैं. अहो देवानुप्रिय ! इस अर्थ को तुम स्वयं ज्ञान से विचारो. ऐसा करके उन अन्यतीर्थिकों को
सातवा शतकका दशवा उद्देशा
पंचमांग विवाह पण्ण
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