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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
गा० गाथपति ॥ १ ॥ तक तब ते ० उन अ० अन्यतीर्थिक अ० एकदा ए० एक स० सहित स० {आयेहुवे को स० बैठेदुवे को सं० आसनपे बैठेहुवे को ए० ऐसा मि० परस्पर क० कथासमुल्लाप स० उत्पन्न हुदा ए० ऐसे स० श्रमण ना० ज्ञात पुत्र पं० पांच अ० अस्तिकाय प० प्ररूपते हैं ध० धर्मास्ति काय जा० यावत् आ० भाकाशास्तिकाय त० तहां स श्रमण ना० ज्ञातपुत्र च० चार अ० आस्ति अण्णवालए, सेलवालए. संखवालए, सुहत्थी, गाह्रावई, ॥ १ ॥ तरणं तसें अण्णउत्थियाणं अण्णयाकयाई एमयओ सहियाणं समुत्रागयाणं सष्णिविद्वाणं संनिसण्णाणं अयमेवारूचे मिहोकहास मुलाचे समुप्पजित्था, एवं खलु समणे नायपुत्ते पंच अथिका पण धम्मत्थिकार्य जाव आगासत्थिकायं, तत्थणं समणे नायपुत्ते चत्तारि अस्थिका अजीवकाए पण्णवेइ तंजहा - धम्मत्थिकार्य, अहम्मत्थिकार्य, आगासत्थिकार्य, पोग्गलात्थकायं, एगं च णं समणे नायपुत्ते जीवत्थिकायं अरुविनामोदक, नमुदक, अर्णपालक, शैलपालक, शंखपालक सुहस्ती व गाथापति नाम के अन्यतीर्थियों रहते थे. { ॥ १ ॥ उस समय में एकदा वे सव अन्यतीर्थिक एकत्रित मीलकर एक स्थान पर बैठे थे. वहां परस्पर ऐसा वार्तालाप करने लगे कि भ्रमण ज्ञात पुत्र ने धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवा - } (स्तिकाय व पुद्गलास्तिकाय ऐसी पांच अस्तिकाय प्ररूपी है. उस में से धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आ
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
सातवा शतक का दशवा उद्देशा
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