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(९) परस्पर ऐक्यकी वृद्धि ।
(१) किसी भी साधु-साध्वीजी या उसके समुदायकी निंदा करनी नहीं ।
(२) परस्पर में आक्षेपपूर्ण लेख या पेपर लिखना या लिखवाना नहीं । और व्याख्यानमें भी आक्षेप करना नहीं ।
(३) किसीका किसी प्रकारका दोष मालुम होवे तो उनको मिलके सुधारा करनकी प्रेरणा करनी, और उन्होंने भी उस दोषको सुधारनेका प्रयत्न करना ।
(४) लोगों में भिन्नता न मालुभ हो उस तरह परस्परमें उचितता से बर्तना ।
(१०) धर्मके उपर होते आक्षेपों के संबंध में ।
(१) अपने परमपवित्र पूज्यशास्त्र तथा तीर्थ विगैरहके उपर होते आक्षेपोंके समाधानके लिये (१) आचार्य महाराज श्रीमत् सागरानंदसूरिजी (२) आचार्य महाराज श्रीमद् विजयलब्धिसूरिजी (३) पन्यासजी महाराज श्रीमान् लावण्यविजयजी, (४) मुनिराज श्री विद्याविजयजी और (५) मुनिराज श्री दर्शनविजयजीकी समिति कायम की है। उस समितिने उस कायको नियमावलि तैयार करके शुरु करना | और अन्य सब साधुओंने उस विषयमें उचित सहायता अवश्य करनी, और उस समितिको आवश्यक सहायता देनेकी श्रावकों को भी प्रेरणा व उपदेश देना ।
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