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________________ (६) साधुसंस्थामें ज्ञानादिका प्रचार । (१) समुदायके बडे साधुने या उन उन आगमोंके ज्ञाता मुनिओंने साधुओंको आगमोंका अभ्यास कराना चाहिये। (२) समुदायके बडे साधुने साधुओंकी दर्शनश्शुद्धिमें वृद्धि हो ऐसा प्रयत्न करना चाहिये । (३) साधु चारित्र क्रियामें तत्पर रहें इसके लिये बडोंको अवश्य ख्याल रखना चाहिये। (४) सब साधुओंका व्याकरण, न्याय, साहित्य आदि हरएक विषयका ज्ञानाभ्यास एक स्थानमें हो सके ऐसी एक संस्था कायम हो ऐसा उपदेश, साधुओंने श्रीसंघको, देना उचित है। (७) देशना (१) साधुने, श्रोता मिथ्यात्वादि आश्रवमें उत्तेजित न हो और श्रीवीतरागदेवादिकी श्रद्धा और पापकी विरतिका पोषक हो | ऐसा ध्यानमें रखते हुए, वीतरागप्रणीत धर्मप्रधान देशना देनी । (८) श्रावकोन्नति। (१) श्रावकश्राविकाओंने, धन धान्य वस्त्र आभूषण आदि सब योग्य वस्तुमे धर्मकी उन्नति और स्थिरताका ख्याल रखकर श्रावक श्राविकाकी द्रव्य भक्ति तथा श्री वीतरागदेव और साधुओंके प्रति भावनापूर्ण बनानेरूप भावभक्ति करनी । माधु उस विषय में उपदेश दे सकते हैं। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.ininelibrary.org
SR No.600251
Book TitleAkhil Bharatiya Jain Shwetambar Muni Sammelanne Sarv Sammati se Pattak rup me Kiye Hue Nirnay Vikram Samvat 1990 Year 1934
Original Sutra AuthorShree Sangh Rajnagar
Author
PublisherShree Sangh Rajnagar
Publication Year1934
Total Pages28
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript, Tithi, Devdravya, & History
File Size4 MB
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