SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 20
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (६) दीक्षा, ऋतुबद्ध कालमें, तिथि नक्षत्र आदि मुहूर्त देखकर शुभ दिनको देनी। । (७) उम्रकी अपेक्षासे अतिशय वृद्धावस्था न हो वहांतक दीक्षा देनी। (८) पदस्थ, बडे या गुरु इन तीनमेंसे किसीभी एकको बिना पूछे दीक्षा देनी नहीं । २ देवद्रव्य (१) देवद्रव्य-जिनचैत्य और जिनमूर्तिके सिवाय दूसरे किसी क्षेत्रमें खर्चा नही जाय। . (२) प्रभुके मंदिरमें या मंदिरके बाहर किसीभी स्थानमै जो जो बोली प्रभुके निमित्त बोली जाय वो सब देवद्रव्य कहलाता है। (३) उपधान संबंधी माला वगैहकी आमदनी देवद्रव्यमें ले जाना उचित मालुम होता है। (४) श्रावकोंको अपने धनसे प्रभुपूजा आदिका लाभ लेना चाहिये, परन्तु किसी स्थानमें अन्य सामग्रीके अभावमे प्रभुपूजा आदिमें हरकत आती है ऐसा मालुम होवे तो देवद्रव्यमें से प्रभुपूजा आदिका प्रबन्ध करना। लेकिन प्रभुका पूजन आदि लो अवश्य ही होना चाहिये। (५) तीर्थ और मंदिरोंके व्यवस्थापकोंको तीर्थ और मंदिर संबंधी कार्यके लिये आवश्यकीय रकम रखके बांकीकी रकममेंसे, तीर्थोद्धार, जीर्णोद्धार व नवीन मंदिरोंके लिये उचित सहायता देनी चाहिये, ऐसी यह सम्मेलन सलाह देता है। Jain Education n ational For Personal & Private Use Only www.ininelibrary.org
SR No.600251
Book TitleAkhil Bharatiya Jain Shwetambar Muni Sammelanne Sarv Sammati se Pattak rup me Kiye Hue Nirnay Vikram Samvat 1990 Year 1934
Original Sutra AuthorShree Sangh Rajnagar
Author
PublisherShree Sangh Rajnagar
Publication Year1934
Total Pages28
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript, Tithi, Devdravya, & History
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy