SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 19
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गच्छ या समुदायम दुसरा संघाडा न हो उन्होंने अपने समुदायके दो योग्य साधुओंके पास योग्यताकी परीक्षा कराके दीक्षा देनी। दीक्षा प्रशस्त स्थानमें आमतौरपर, शुभ मुहूर्तमें देनी । दीक्षालेनेवालेको, दीक्षादेने के पश्चात्, ग्रहणशिक्षा और आसेवन शिक्षाके लिये सोलह वर्षकी उम्र तक श्रुत-पर्यायस्थविर साधुओं के पास रखना उचित है । यदि उसके पिता आदि निकटके संबंधीने दीक्षा ली हो और वो ( संबंधी) उसको बराबर सम्हाल सके ऐसा हो तो उस साधुको उसके पिता आदिके पासभी रखनेमें हर्ज नहीं है। (२) सोलह वर्षसे उपरकी दीक्षा शास्त्रोक्त “शिष्य निष्फेटिका" नहीं लगती, तो भी यह समस्त इन्तजाम, (व्यवस्था) कितनेक अंशमें, अनिच्छनीय वातावरण के कारण प्रस्तावके रूपमें करनेमें आया है, और उसीके अनुसार निर्णय करनेमें आता है कि-सोलहसे अढारह वर्ष तकके दीक्षालेने वालेको भी उसके सरपरस्तकी आजाके बिना दीक्षा देनी नहीं। (३) अढारह वर्षसे अधिक उम्रवाले दीक्षालेनेवालेने माता, पिता, भगिनी, भार्या आदि जो निकटके संबंधी हों उनकी अनुमति प्राप्त करनेके लिये उन उन प्रयत्नोंके करते हुए भी यदि अनुमति न पा शके तो (वो) दीक्षा ले सकता है। . (४) दीक्षा लेनेवालेने, अपनी स्थिति के अनुसार अपने वृद्ध मातापिता स्त्री और पुत्र पुत्रीके निर्वाहका प्रबंध किया होना चाहिये। (५) दीक्षा देनेवालेको दीक्षालेनेवालेंमें अढारह दोषमेसे कोई दोष न हो इसका ख्याल रखना चाहिये । For Personal Price Only
SR No.600251
Book TitleAkhil Bharatiya Jain Shwetambar Muni Sammelanne Sarv Sammati se Pattak rup me Kiye Hue Nirnay Vikram Samvat 1990 Year 1934
Original Sutra AuthorShree Sangh Rajnagar
Author
PublisherShree Sangh Rajnagar
Publication Year1934
Total Pages28
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript, Tithi, Devdravya, & History
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy