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इसके पश्चात् तीसकी समितिकी सर्वसम्मतिसे यह कच्चा मसोदा नौ वृद्धोंको निर्णय करने के लिये इस शर्तसे सुपूर्द किया गया कि ये नौ वृध्ध मुनिवर सर्वसम्मतिसे जो निर्णय करे उनको सर्व मुनियोंने मान्य रखना। बादमें ये नौ वृद्ध महापुरुषकि जिनके हस्ताक्षर (इस) निर्णय के अन्तमें दिये है-उन्होंने शास्रोंके विधिनिषेध कायम रखते हुए द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावका विचार करके जो निर्णय दिये हैं वे सब मुनिमहाराजोंकी समक्ष जाहिर किये जाते हैं।
१दीक्षा..
. (१) आठसे सोलह वर्ष की उम्र पर्यंत मातापिता या जिस समय जो सरपरस्त [वाली-पालक हो उसकी आज्ञा लिये बिना दीक्षा नहीं दि जा सकती (बिना इजाजत दीक्षा नहीं देना) क्योकि-वहांतक "शिष्य-निष्फेटिका" लगती है। - आठसे सोलह वर्ष वालेकी दीक्षा, दीक्षालेनेबाली व्यक्तिके मातापिता या सरपरस्तकी लिखित सम्मति लेनी। जिस गांवमें दीक्षा देनी हो वहांके स्थानिक दो प्रतिष्ठित श्रावकोंकी मारफत लिखित सम्मतिके अनुसार-लिखित सम्मति देने वाली व्यक्ति,-दीक्षा लेनेवालेके मातापिता या सरपरस्त हैं, उस बातका निर्णय, दीक्षालेनेवालेके गांवमें आदमी भेजकर, कराना चाहिए और, ( इस बातका) निर्णय होनेके पश्चात दीक्षा देनी चाहिए।
दीक्षालेनेवालेकी योग्यताकी परीक्षा सामान्य तया स्वयं करने के बाद अधिक सम्मतिके लिये हरेक गच्छवालेने अपने संघाडेके सिवाय दुसरे संघाडेके दो आचार्य या दो वृद्धों के पास योग्यताकी परीक्षा करानी और बादमे दीक्षा देवी । जिस
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