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किया. अनेक समिति नियुक्त का
होना दुःशक्य माना जाता था,
माना जाता था । परन्तु अपने
घंटे-ऐसे सिर्फ ३३ दिनमें निर्णय करनेके विषयोंकी पसंदगी की, उनके बारेमें शास्त्रीय चर्चा की, द्रव्य-क्षेत्र काल-भावका विचार किया, अनेक समिति नियुक्त की और सर्वसम्मतिसे सफल निर्णय किये।
सम्मेलन मिलनेके पूर्व सब साधुओंका एकत्रित होना दुःशक्य माना जाता था, मिलनेके पश्चात् (आपसमें) प्रेमभावका वर्ताव भी दुःशक्य माना जाता था और अन्तमें सर्वसम्मतिसे निर्णय कर सकेंगे यह तो अशक्य ही माना जाता था । परन्तु अपने पू. मुनिमहाराजोंने उनके हृदयकी उदारतासे उन सब मान्यताओंको झूठी साबित की हैं, इतना ही नहीं किन्तु,-यह सम्मेलन,-किसी स्वार्थवश या अपनी मान्यता दूसरोंके उपर लाद देनेके उद्देशसे किया गया है-ऐसी ऐसी बातें मुनिसंम्मेलनके सर्वमान्य निर्णयोंसे बेबुनियाद साबित हुई हैं। मैं तो पहिलेसे ही कहेते आया हूँ कि-"अपने साधु वे साधु ही हैं"। . कच्छ, काठिआवाड, मालवा, मारवाड, बंबइ और देहली जेसे दूर दूरके और नजदिकके प्रदेशोभेसे सतत और कठिन पादविहार करके अल्प समयमें, अपने निमन्त्रणसे मुनिमहाराज व साध्वीजीमहाराजने यहां पधारकर अपने श्रीसंघको अत्यंत ऋणी बनाया है । और आज अपने राजनगरको जो सुयश प्राप्त हुआ है वो सब इन मुनिमहाराजोंका ही प्रताप है। ___अन्तमें ऐसे महान् ऐतिहासिक मुनिसम्मेलनको निमंत्रण करके उसकी सुव्यवस्था सम्हालनेका कार्य अत्यंत कठिन होने पर
भी जो सफलता मिली है यह अपने श्री संघके उत्साह पूर्ण सहकारका ही परिणाम है। __ जिन जिन भाइओंने भिन्न भिन्न समितिओं मे रहकर-और कितनेकने मेरी साथ ही रहकर-इस शुभ कार्यमें जो सेवा दी है-उन सबका मैं अपने अंतःकरणसे उपकार मानता हूं।
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