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| ( साधु साध्वी की भक्ति करनेवाली ) समिति, सेवादलसमिति और मंडपसमिति कायम की थी। और इन समितिओने आजदिन 2 पर्यत बहुतसी मीटिंगे भरके अपनी फर्ज संतोषकारक रीत्या, अदा की है।
महाशुक्ला ५ से मुनिसम्मेलनकी निमंत्रण पत्रिकायें हरएक पू. आचार्यादि मुनिवर्योको, यथाशक्य, गृहस्थोंकी मारफत हाथोंहाथ पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी।
फाल्गुन शुक्ला १५ की रातको आठ बजे श्रीसंघकी सभा एकत्रित करके, वहाँ तक किया हुआ कार्य विदित करनेमें आया था।
पहिलेसे प्रसिद्ध किये के अनुसार फाल्गुन कृष्णा (चैत्र कृष्णा) ३ के मध्यान्हको विजयमुहूर्तमें चतुर्विध श्रीसंघ एकत्रित हुआ था । इस अवसरपर ४०० से अधिक पूज्य मुनिवर्य, ७०० से अधिक साध्वीजी महाराज और ११ हजारसे अधिक श्रावक श्राविकाओंकी भव्य उपस्थिति में, आरंभ में मंगल निमित्त श्री स्नात्रपूजा तथा शांतिकलश पढाया गया और मेरा स्वागतका व्याख्यान हुआ व सम्मेलनकी सफलता के संदेश पढ सुनाये थे । तत्पश्चात श्रीसंघने, पधारे हए पूज्य मुनिवयाँको चंदन किया था। बादमें पू. मुनीवर्य मुनिसम्मेलनके पंडालमें पधारे थे। ___यह समस्त प्रसंग अनुपम था। हरएककी मुखमुद्रा के उपर अपूर्व आनन्द व उन्माह दिग्बाई देता था । जिन्होंने वह पुण्यदृश्य देखा है. उनके हृदयपटपर वह दृश्य चिरस्मरणीय रहेगा यह निःशंक है।
मुनिसम्मेलनकी कार्यवाही शुरुसे ही गुप्ततया चलती थी। और मेरे जरियेमे मम्मेलनकी ओर से जाहिर किया गया था कि किसीभी वर्तमानपत्र में प्रकाशित किसीभी समाचारको महत्व देना नहीं। इस बातको ख्यालमें रखकर, अपनी समाजने, नोआचायो
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