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________________ श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नानादि विधि | पछी लोगस्स० सव्वलोए वंदणवत्तिआए अन्नत्थ० कही एक नवकारनो काउ० करी, पारी नीचेनी स्तुति कहे ओमिति मन्ता यच्छा-सनस्य नन्ता सदा यदंहीश्च । आश्रीयते श्रिया ते, भवतो भवतो जिनाः पान्तु । पछी पुक्खरवरदी० सुअस्स० वंदणवत्तिआए० अन्नत्थ० कही एक नव० काउ० पारी स्तुति कहे, ते आस्व नवतत्त्वयुता त्रिपदी-श्रितारुचिज्ञानपुण्यशक्तिमता-वरधर्मकीर्तिविद्या-नन्दास्या जैनगीर्जीयात् । पछी सिद्धाणं वृद्धाणं० श्रीशान्तिनाथआराधनार्थं करेमि काउस्सग्गं, वंदणवत्तिआए० अन्नत्थ कही एक लोगस्सनो काउस्सग्ग करी, पारी, नमोऽर्हत् कही, स्तुति कहेवी, ते आ श्रीशान्तिः श्रुतशान्तिः, प्रशान्तिकोऽसावशान्तिमुपशान्तिम् । नयतु सदा यस्य पदाः, सुशान्तिदाः सन्तु सन्ति जने ॥४॥ . पछी श्रीद्वादशांगी आराधनार्थं करेमि काउ० वंदणवत्तिआए० अन्नत्थ० कही एक नवकारनो काउ० करी, पारी नमोऽर्हत् कही, स्तुति कहे, ते आ श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नानादि विधि ॥८९ ॥ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.ininelibrary.org
SR No.600250
Book TitleVividh Pujan Sangraha
Original Sutra AuthorChampaklal C Shah, Viral C Shah
Author
PublisherAnshiben Fatehchandji Surana Parivar
Publication Year2009
Total Pages266
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size21 MB
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