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________________ श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नात्रादि विधि ॥ ९ ॥ Jain Education International जीवा निरवद्यार्हत्पूजायां निर्व्यथाः सन्तु, निष्पापाः सन्तु, सद्गतयः सन्तु, न मेऽस्तु संघट्टनहिंसापापमर्हदर्चने स्वाहा । आ मंत्र वडे जलशुद्धि करीए. (४) पछी वासक्षेप अंजलिमध्ये लईने - ॐ सूर्यसोमाङ्गारकबुधगुरुशुक्रशनैश्चरराहुकेतुप्रमुखाग्रहा इह जिनपादाग्रे समायान्तु, पूजां प्रतीच्छन्तु । आ प्रमाणे बोलीने नव ग्रहनो पाटलो होय तो ते ठेकाणे, न होय तो प्रभुजी बेठा होय तो पट्ट उपर वासक्षेप करीए । पछी अष्टद्रव्यथी पूजा करवी ते आ प्रमाणे : १ आचमनमस्तु, २ गन्धोऽस्तु, ३ पुष्पमस्तु, ४ अक्षतोऽस्तु, ५ फलमस्तु, ६ नैवेद्यमस्तु, ७ धूपोऽस्तु, ८ दीपोऽस्तु । पछी हाथमां फूल लई - ॐ सूर्यसोमाङ्गारक बुधगुरुशुक्रशनैश्चरराहुकेतुप्रमुखा ग्रहाः सुपूजिताः सन्तु, सुग्रहाः सन्तु, पुष्टिदा सन्तु, तुष्टिदा: सन्तु, मङ्गलदा: सन्तु, महोत्सवदाः सन्तु । आ प्रमाणे कही ग्रहो उपर पुष्पो चडाववां । For Personal & Private Use Only श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नात्रादि विधि ॥ ९ ॥ www.jainelibrary.org
SR No.600250
Book TitleVividh Pujan Sangraha
Original Sutra AuthorChampaklal C Shah, Viral C Shah
Author
PublisherAnshiben Fatehchandji Surana Parivar
Publication Year2009
Total Pages266
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size21 MB
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