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विविध पूजन संग्रह
स्तवन (१) गौतम गणधर नमीये हो । अहोनिश गौतम० नाम जपत नव निधि हि निधि पाइए। मनवांछित सुख लहिए। घर आंगन जो सुरतरु फलिओ । कहां काज वन भमीए । सरस सुरभि घृत जो होय घरमें । तो क्युं तेले जमीए, हो० तैसी श्रीगौतम गुरु सेवा । और ठौर क्युं रमीए, हो० गौतम नामे भवजल तरीए । कहां बहढत तन दमीए, हो० गुण अनंत गौतम के समरन । मिथ्यामति विष भमीए, हो० जस कहे गौतम गुण रस आगे । रुचत न है हम अमीए, हो०
॥ १२८ ॥
श्री गौतमस्वामी पूजनविधि ॥१२८॥
वीर मधुरी वाणी भाखे, जलधि जल गंभीर रे । इन्द्रभूति चित्त भ्रांति, रजकण हरण प्रवर समीर रे ॥ वीर० ॥१॥ पंचभूत थकी ज प्रगटे, चेतना विज्ञान रे । . तेहमां लयलीन थाये, न परभव संज्ञान रे ॥ वीर० ॥२॥
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