________________ द्वादशः प्रकाश योग- T पुंसामयत्नलभ्यं ज्ञानवतामव्ययं पदं नूनम् / यद्यात्मन्यात्मज्ञानमात्रमेते समीहन्ते // 11 // शास्त्रम् अव्ययं पदं परमात्मरूपता / शेष स्पष्टम् // 11 // एतदेव स्पष्टयति॥३६॥ श्रयते सुवर्णभावं सिद्धरसस्पर्शतो यथा लोहम् / श्रात्मध्यानादात्मा परमात्मत्वं तथाऽऽप्नोति // 12 // स्पष्टा // 12 // एतच्च सुज्ञानमवेत्याह जन्मान्तरसंस्कारात्स्वयमेव किल प्रकाशते तत्त्वम् / सुप्तोत्थितस्य पूर्वप्रत्ययवन्निरुपदेशमपि // 13 // यैन जन्मान्तरे आत्मज्ञानमभ्यस्तं तस्य सुप्तप्रबुद्धस्य पूर्वार्थप्रत्यय इवात्मज्ञानं भवति // 13 // इतरस्य तु अथवा गुरुप्रसादादिहैव तत्त्वं समुन्मिपति नूनम् / गुरुचरणोपास्तिकृतः प्रशमजुषः शुद्धचित्तस्य // 14 // इहवे इहजन्मन्येव जन्मान्तरसंस्कारं विनापीत्यर्थः॥ 14 // उभयत्रापि गुरुमुखप्रेक्षित्वमनिवार्यमेवेत्याहतत्र प्रथमेतत्त्वज्ञाने संवादको गुरुर्भवति। दर्शयिता त्वपरस्मिन् गुरुमेव सदा भजेत्तस्मात् // 15 // 9 // Jain Education in For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org