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________________ व्याख्या- च णं से पुरिसे कातियाए जाव पाणाइवायकिरियाए पंचहिं किरियाहिं पुढे, जेसिंपिय णं जीवाणं सरीरेहितो |१६ शतके प्रज्ञप्तिः | अए निव्वत्तिए अयकोट्टे निवत्तिए संडासए निवत्तिए इंगाला निवत्तिया इंगालकड्डिणि निव्वत्तिया भत्था निव उद्देशः१ अभयदेवी|त्तिया तेवि णं जीवा काइयाए जाव पंचहि किरियाहिं पुट्ठा । पुरिसे णं भंते ! अयं अयकोहाओ अयोमएणं अयाकर्मया वृत्तिः२ |संडासएणं गहाय अहिकरणिंसि उक्खिबमाणे वा निक्खित्वमाणे वा कतिकिरिए ?, गोयमा ! जावं च णं से णि क्रियाः सू ५६३ ॥६९७॥ पुरिसे अयं अयकोट्ठाओ जाव निक्खिवइ वा तावं च णं से पुरिसे काइयाए जाव पाणाइवायकिरियाए पंचहिं किरियाहिं पुढे, जेसिपि णं जीवा णं सरीरेहितो अयो निबत्तिए संडासए निवत्तिए चम्मेढे निवत्तिए मुट्टिए निवत्तिए अधिकरणि अधिकरणिखोडी णि उदगदोणी णि अधिकरणसाला निवत्तिया तेवि णं जीवा काइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुट्ठा (सूत्रं ५६३)॥ oil 'पुरिसे णं भंते !'इत्यादि, 'अर्य'ति लोहम् 'अयकोट्टसित्ति लोहप्रतापनार्थे कुशूले 'उविहमाणे वत्ति उत्क्षिपन् || वा 'पविहमाणे व'त्ति प्रक्षिपन् वा 'इंगालकडिणि'त्ति ईषद्वारा लोहमययष्टिः "भत्थ'त्ति ध्मानखल्ला, इह चायःप्रभृः॥8 तिपदार्थनिर्वर्त्तकजीवानां पञ्चक्रियत्वमविरतिभावेनावसेयमिति । 'चम्मेहे'त्ति लोहमयः प्रतलायतो लोहादिकुट्टनप्रयोजनो लोहकाराद्युपकरणविशेषः, 'मुहिए'त्ति लघतरो घनः 'अहिगरणिखोडि'त्ति यत्र काष्ठेऽधिकरणी निवेश्यते 'उदगदो- ॥६९७॥ दिणि'त्ति जलभाजनं यत्र तप्तं लोहं शीतलीकरणाय क्षिप्यते 'अहिगरणसाल'त्ति लोहपरिकर्मगृहम् ॥ प्राक्कियाः प्ररूपिता-| |स्तासु चाधिकरणिकी, सा चाधिकरणिनोऽधिकरणे सति भवतीत्यतस्तद्वयनिरूपणायाह SEARCHSASURROR dain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600226
Book TitleBhagwati sutram Part 03
Original Sutra AuthorAbhaydevsuri
Author
PublisherAgamoday Samiti
Publication Year1921
Total Pages654
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size13 MB
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