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१७ शतके उद्देशः१ उदायिभू. | तानन्दौ | सू ५९० तालादिपचालनादौ
परिसे णं भंते नपुरिसे तालमा
व्याख्या- रार्थानुगतश्चतुर्दशः १४ 'विजु'त्ति विद्युत्कुमाराभिधायकः पञ्चदशः १५ 'वाउ'त्ति वायुकुमारवक्तव्यतार्थः षोडश १६
प्रज्ञप्तिः 'अग्गि'त्ति अग्निकुमारवक्तव्यतार्थः सप्तदशः १७ 'सत्तरसे'त्ति सप्तदशशते एते उद्देशका भवन्ति । तत्र प्रथमोद्देशकार्थ- अभयदेवी- प्रतिपादनार्थमाह-रायगिहे'इत्यादि ॥ 'भूयाणंदे'त्ति भूतानन्दाभिधानः कूणिककराजस्य प्रधानहस्ती ॥ अनन्तरं या वृत्तिः२६
भूतानन्दस्योद्वर्तनादिका क्रियोक्तेति क्रियाऽधिकारादेवेदमाह॥७२॥ पुरिसे णं भंते ! तालमारुहइ ता०२ तालाओ तालफलं पचालेमाणे वा पवाडेमाणे वा कतिकिरिए ?
गोयमा ! जावंच णं से पुरिसे तालमारुहइ तालमा०२ तालाओ तालफलं पयालेइ बा पवाडेइ वा तावं च णं से पुरिसे काइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुढे, जेसिंपिय णं जीवाणं सरीरोहिंतो तले निबत्तिए तलफले निवत्तिए तेऽविणं जीवाकाइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुट्ठा ॥ अहे णं भंते ! से तालप्फले अप्पणो गरुयत्ताए जाव पच्चोवयमाणे जाई तत्थ पाणाई जाव जीवियाओ ववरोवेति तए णं भंते ! से पुरिसे कतिकिरिए ?, गोयमा ! जावं च णं से पुरिसे तलप्फले अप्पणो गरुयत्ताए जाव जीवियाओ ववरोवेति तावं च णं से पुरिसे काइयाए जाव चरहिं किरियाहिं पुढे, जेसिपिणं जीवाणं सरीरोहिंतो तले निबत्तिए तेवि णं जीवा काइयाए जाव चउहिं किरियाहिं पुट्ठा, जेसिपिणं जीवाणं सरीरोहिंतोतालप्फले निवत्तिए तेविणंजीवा काइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुट्ठा, जेविय से जीवा अहे वीससाए पच्चोवयमाणस्स उवग्गहे वटुंति तेऽविय णं जीवा काइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुट्टा ॥ पुरिसे णं भंते ! रुक्खस्स मूलं पचालेमाणे वा पवाडेमाणे वा कति
क्रिया:
पुढे, जेसिमिया ॥ अहे णं भतभते ! से पुति
विधाओवनवत्तिए तेवि जीवा काइयाए ।
सू ५९१
RSACROCARRCOALA
SAMASSACROSAGAOS
॥७२०॥
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