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जीतसंग्रह
अध्यात्म-36 विचार
स्वभावलीनानिवसन्तिनित्यं । जानाति योगी स्वयमेव तत्वं ॥ १२ ॥ श०-(परमात्मतत्त्वं) जहांपर परमात्मतत्व है याने जहांपर शुद्ध आत्मतत्त्व ज्ञान रहा हुआ हैं तहांपर कोईभी | all तरहका (समस्त संकल्प विकल्प मुक्तं) संकल्प विकल्प नही ठरह सक्ता अर्थात सब तरहके संकल्पसें आत्मा मुक्त
होनेपर (आनंदरूप) सदा आनंद रूपही है ऐसे परमात्मध्यानमें योगीराज (नित्यं) सदा (स्वभावलीना) अपने स्वभावसेंही लीन [निवसन्ति रहते हैं धन्य हैं ऐसे महापुरुष योगीस्वरोंको धिकार है मेरे जैसे पुद्गलानंदि भोगियोंको भावार्थ जो शुद्ध परमात्मरूपी आत्मा है वह सर्व तरहके संकल्पोंसे रहित है और सदा परम आनंदमयी हैं जो योगी महापुरुष सदा अपने शुद्ध स्वरूपमें खेलते हैं वह योगीराज स्वयमेवही परमात्मतत्त्वको जान लेते है ॥ १२॥ मल-चिदानंद मयं शुई । परापायं निरामयं ॥ अनंत सुख संपन्नं । सर्व संग विवर्जितं ॥ १३ ॥
श०-[चिदानंद मयं शुद्धं] पुनः आत्मा कैसा है कि ज्ञाम आनंद मय शुद्ध स्वरूप है जिसका पुनः [निरामय | रोगादिक उपद्रवसे वर्जित और [अनंतसुख संपन्नं] अनंतसुख संयुक्त स्वरूप है जिस परमात्माका और [सर्व संग विवर्जितं] सर्व संगसें वर्जित शुद्ध स्वरूप है जिसका भावार्थ जो परमात्मा शुद्ध तत्व हैं याने जो शुद्ध आत्मस्वरूप | है वह ज्ञान आनंदमयी सदा शुद्ध है और सर्व तरहके कष्टसे वर्जित है और बाह्य अभ्यंतर सर्व प्रकारसे परसंगसे रहित है ॥ १३ ॥ पुनः कैसा है आत्मस्वरूप
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