SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 91
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री प्रशमरति प्रकरणम् ॥ ३७ ॥ ६+<******** Jain Education Interna १ मुनिए कंड पण कार्य गुरु महाराजनी श्राज्ञापूर्वकज करवानुं निरंतर ध्यान राखनुं २ जो मुनिने विषयपीडा थाय तो हलको आहार करवो, उणोदरी करवी, स्थिर काउसग्ग ध्याने रहेवुं ग्रामांतर जनुं, छेवटे आहार पाणीनो त्याग करी देवो, पण स्त्रीसंसर्गमां कदापि फसावुं नहि. ३ सर्वने स्वसमान लेखीने मुनिए संयमानुष्ठानमां सावधान थइ रहेवुं. जेवुं आपणने दुःख थाय छे तेतुं सर्व कोइने थाय छे एम समजी कोइने कंद पण दुःख थाय एम करवुं नहि, सर्व कोइने सुखज प्रिय छे एम विचारखं. तात्पर्य के पर दुःखं उपजावतां प्रथम पोतानोज विचार करवो एटले के आपने कोइ दुःख उपजावे तो ते केबुं लागे १ एम दरेक बाबत प्रथम पोतानी उपरज अजमावी जोवी. अध्ययन छटुं. (धूत) १ जंतुनां दुःखनी परिसीमा नथी. जीवो निःसार देहने माटे पाप करीने दुःखी थाय छे. २ विवेकहीन जीवो रोग चिकित्सामां लाखो जीवोनो नाश करे छे पण तेथी कंइ रोग तो मटतो नथी, मुनिए एवी चिकित्सा करवी नहिं. केमके हिंसा महा भयंकर छे. ३ कर्मोने आत्माथी दूर करवा माटे संयममां उत्साहवान् रहने परिमित आहार लइ पेटने अपूर्ण राखता रहेवुं, सर्व परीषद उपसर्गने समता भावथी सहन करता रहे. For Personal & Private Use Only *03+++******+******+ 1130 11 www.jainelibrary.org
SR No.600205
Book TitlePrashamrati Prakaranam
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
Author
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1932
Total Pages240
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy