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________________ यशोधर ॥१०॥ EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE रानि-गंगनमपि विरेजे शैलराजांगनान्निः ॥ ३२॥ तासां मध्ये कुवलयदृशां व्यंतरीदेवता-चौरंत्र नां । प्रत्यक्षानूदथ लगवती देवता चंडमारिः॥ नीलोन्मीलन्मृगमदमषीलांछिताखंडगंमा । चंचच्चूडाऽमलनिवसना चारुचंशननश्रीः ॥ ३३ ॥ निर्दोषदंतकलिकाकिरणबदानिः । कुर्वाणया दशदिशः कुसुमावतंसाः॥ सवीमयानयरुचौ प्रथमं तदानी-मूचे तया मगधनूतलबालचंः ॥ ३४ ॥ हे मारिदत्त किमिदं तव वेदितव्यं । नित्यं यदंबरजलस्थलजीवहिंसाः ॥ आक्षिप्य सादविषयं किल राजधर्म । यत्त्वं प्रतीबसि निशाचरदेवदासीः ॥ ३५ ॥ . प्रत्यदया न च मयानुमतो वधार्थ । मुक्तिप्रदानविषये क्व वयं समर्थाः ॥ अस्मरं मृगदृशो गृहिणां सुशीला । धिम्विप्रतारित इतः कितवैः कुतस्त्वं ॥ २६ ॥ औदारिकेऽपि विषये सुमहाननंग-क्रीमारसो न हि नवेन्मदनाकुलानां ॥ आकर्ण्य कर्णविवरामृतवारिकुख्याः । कांता गिरोऽनयरुचेः शशिकांततुल्याः ॥ ३७ ॥ अद्य प्रमोदपदवीमधिगम्य सम्यक् । प्रा. ॥१०॥ तास्मि कामपि पुनः परमां निवृत्तिं ॥ वास्मादृशां मदनकुंजरदान गः । क्वायं स्मरधिरदरोधहरिः प्रबोधः ॥ ३० ॥ तुष्टादमत्रनवते प्रणमामि दूरा-द्योगीश्वराजयरुचे जगवनम EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE Jan Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600192
Book TitleYashodhar Charitra
Original Sutra AuthorManikyasuri
Author
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1910
Total Pages130
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size9 MB
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