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________________ सिरिचंदरायचरिप ॥ ८१ ॥ Jain Education International जामायरस्स गय-हय-रह- रयण-मुत्ताहळ - सुवण्ण-रयय- वसण - भायण-सयणाइयं च जं मग्गियं तं सव्वं अप्पित्था । तओ वरकण्णाहिं 'कंसारासणववहारो कुणिओ । 'नीरंगीपच्छाइयाणणा पेमलालच्छी वि स सामिणो मुहपंकयं पेक्खती बहुपमोयभरभरिया संजाया, विहिणो य सा महुवयारं मण्णित्था । इओ भवियन्वयाजोगेण are दाहिणोयणं फुरियं, तेण सा भिसं चिंताउला जाया, अकम्हा नयणफुरणेण इमस्स किं फलं होही ? इअ चितमाणी सा कास वि अग्गे तं वृत्तंतं न कहित्था । अह एवं विवाहमहोच्छवे संपुण्णे सिंहलाहिवेण विविहदाणा रई दाऊण अस्थिजणो परं संतोसं पाविओ, पवराई मंगलतुरियाई बाइयाई । एयम्मि समए वरकण्णाओ सारीकी काउं उवविसित्था, पढमं चंदराओ हत्थेण अक्खे वेत्तण पक्खिवंतो सिंहलनरवइपमुहा जह न याणंति तह समस्सापयं भणेइ, तं जहा "आभापुरम्म निवस, विमले पुरे ससहरो समुग्गमिओ । अपत्थिमस्स पिम्मस्स विहिहत्थे हवइ निव्वाहो" ॥१७॥ इत्थं समस्सागाहं निसमित्ता पेमलालच्छी वियारिडं लग्गा, बुहो वि एसो असमंजसं कहं भणेइ ?, तस्स रहस्सं अयाणंती आभापुरिं आगासं मण्णमाणी सा पासे गिव्हिऊण दक्खत्तणेण उत्तरं देइ, तं जहा"वसिओ ससि आगासे, विमलपुरे उग्गमीम जहा सुहं । जेणाभिमओ जोगो, स करिस्सइ तस्स (तेण ) निव्वाहो” ॥१८॥ वित्तूर्णं अक्खे निक्खिवेइ । तीए वृत्तं गाहं निसमिऊणं चंदराओ चिंतेइ - जइ इयं मुद्धा दक्खा वि मए । 'उत्तगाहाए रहस्सं न मुणेइ, अओ अहुणा फुडं बोहेमि त्ति चिंतिऊण कॅरगहियपासगो चंदराओ व इ वस्त्रम् - घूमटो । ३ 1 • उक्तगाथायाः । करगृहीतपाशकः । For Personal & Private Use Only बीओ उद्देसो ॥८१॥ www.jainelibrary.org
SR No.600181
Book TitleSiri Chandrai Chariyam
Original Sutra AuthorKastursuri, Chandrodayvijay
Author
PublisherNemi Vigyan Kastursuri Gyanmandir
Publication Year1971
Total Pages318
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size6 MB
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