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________________ | दुआ न होशे कोय ॥ १८ ॥ ज्ञान सुपात्रानय प्रमुख, जेदे दान अपार ॥ तथापि सुपात्रह दाननो कहुं इहां अधिकार ॥ ११५ ॥ सर्व सावद्यारंजना, वर्जक मुनिवर जेह ॥ सर्वोत्तम कहे तेहने, पात्र साधु गुणगेह ॥ २० ॥ ज्ञानदर्शन चारित्र तप, निर्मल आतम जास ॥ शुद्धाहार मुनिने करे, संवि नाग सो खास ॥ २१ ॥ हरिवाहन नृपनी परे, पामे जिनपद तेह | मोहतणां सुख जोगवे, ज्यां सुखनो नहीं बेह ॥ २२ ॥ ॥ ढाल १ ली ॥ रसीयानी देशी ॥ जरतक्षेत्र में भूषण सारिखो, देश कलिंग इसा नाम ॥ चतुरनर ॥ इति प्रनीति नहि जिहां, प्रजा जणि लक्ष्मी सुखनुं गम ॥ च ॥ १ ॥ ज० ॥ कंचन पर्वतनी परे शोजतुं नगर कंचन पुर खास ॥ च० ॥ धण कण कंचन ऋषि समृद्धि जरयुं, जेहथि दुःख गयुं नास ॥ च० ॥ २ ॥ ज० ॥ तिणिपुरे दीपे तेजे दिनमणि, श्री हरिवाहन राय ॥ च० ॥ हरिवाहन जसरूप अनोपम, अरि सहु नमियोरे पाय ॥ च० ॥ ३ ॥ ० ॥ तास विरंचि नामे सचिवाग्रणी, धीवर आश्रित जेह ॥ च० ॥ ऋषभदेवनो चैत्य कराव्यो, सुंदर चित्रित तेह ॥ च० ॥ ४ ॥ ज० ॥ अन्यदिवस नृप जोवा श्रावतो, श्रीजिनमंदिर तेह ॥ च० ॥ शेठ धनेश्वर जिन गृहागले, दीव्रं तेहनुं गेह ॥ च० ॥ ५ ॥ ज० ॥ अधिकमहोत्सव थाय तस घरे, नारी गावे गीत ॥ च० ॥ ढोल ददामारे धुरे साहोमणा, दाने रंज्या रे चित्त ॥ च० ॥ ६ ॥ ज० ॥ श्ये देतें नृप पूबे सचिवने, एह महोत्सव रे थाय ॥ च० ॥ मंत्री नांखे रे शेक्तले घरे, पुत्र जन्म थयो राय ॥ च० ॥ ७ ॥ ० ॥ ते कारणे थाय बे वधामणां, थयो सदु सज्जन श्रानंद ॥ च० ॥ दाने मागण रलियायत कीधा, जागो सदु दुख छंद ॥ च० ॥ ॥ ज० ॥ चंद्रकिरण जिम निर्मल देहरुं, श्री जिनवरनुं देख ॥ च० ॥ नयण २५ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only >>>>>>>>>> www.jainelibrary.org
SR No.600177
Book TitleVissthanakno Ras
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages278
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size7 MB
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