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॥ ढाल ३ जी ॥ जंबूहीपमझार ॥ ए देशी ॥ पूर्वश्रुत प्रत्याख्याननो, पूर्वश्रुत प्रत्याख्यान ॥ तत्राद्य नवम पूर्व ए, सांप्रत वर्ते सर्व ए॥१॥नोश्रुतप्रत्यख्यान, मूलोत्तरगुण प्रत्याख्यान ॥ विविध मिलिए, तत्र प्रथम देश सर्व दोए प्रकारनो॥ एक एक Salपण इत्वर वलीए॥२॥ यावत्कथिकं तत्र, पंचमहाव्रत प्रत्याख्यान, धम्मिलपरे ए ॥ यावत्कश्रिकसर्व साधुन्नणी दुवे,श्रावकपण अनुव्रत धरे॥३॥ देशगुण मूल, प्रत्याख्यान इत्वर, यावत्कथिक आराधिक ए, थाये मुनिने तत्र ॥ त्रिविध त्रिविध करी, प्रत्याख्यान समायिक ॥४॥ आगारीने पाए दुविध त्रिविध करी, ॥साधु श्रावकने श्म कर्यु ए ॥ करतां तास विनाग, श्रमण
तणां होवे पंच महाव्रत गुण गृह्यां ए ॥५॥ प्राणीवध मृषावाद, अदत्त मेहुण तिम परिग्रह ॥ salपंच पिगणिए, मूलगुण कहियाए श्रमण निग्रंथना, त्रिविध विविध शुं जाणिए ए॥६॥ नत्तर
गुण पचखाण, कहुँ सहु सानलो, तेहना नेद अनेक ले ए॥ अन्नतठ उठ अठमादि वली अन्यह
एहथी, दश प्रकारना जे अ ए॥ ७ ॥ नाम सुणो हवे तास, अपांगय मेकेंत कोटी संहीयं निवvalटियं ए॥ सागारं अांगार परिमाणं करूं। निर्विशेषं नाणियं ए॥ ७ ॥ दस विद ए पचरखाण Salसंकेत अहाय स्वयमेव अणु पालवो ए॥दाणुवे एस समाहे, जिम थाये तिम नावे पाप पखालवो ए
॥ ॥ नवकार पोरसि जाण, पुरीमढे कासणो, एगठाण आंबिल नपुंए ॥ अनिता चरम विचार अंनिगाहा विगश्यं, करतां लान होये घगुंए ॥ १० ॥ दो नेमुकार आगार, षट पोरंसीतणा, साते वयपुरी मढतणाए। एगासणाना आठ, संत एगगणनां, आठ आंबिलनां नहीं घणा ए॥११॥ हवे नितम्नां पांच उपाणी तणां, चरम चार मनधारीयें ए॥अनिंग्रह पंच चतारी, नीवीयें अपनव
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