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॥ दोहा ॥
सगुनो राजा विनय, जिनशासन कहेवाय ॥ राम दम आदिक गुण सदु, ते विण निष्फल श्राय ॥ १ ॥ विनय थकी आदर लहे, सहुने विनय सुहाय ॥ विनय करंतां मानवी, पर पोताना थाय ॥ २ ॥ इह लोके सुख विनयथी, तिर्यंच पण पामंत ॥ मनुष्यनुं कहेतुं किसुं, जे गुण विनय वहंत ॥ ३ ॥ ननय पक्ष शुद्धातमा करी विनय अभ्यास ॥ प्राकृत मुनिनो किशो, चक्री वंदे तास ॥ ४ ॥ अरिहंतादि विषे यति, विधिसुं विनय करेह ॥ फल पामे उपवासनुं, नोजन करतो तेह ॥ ५ ॥
॥ ढाल ६ ही || देशी हमी रियानी ॥
विनय करे त्रिकरण शुद्धसुं, धन मुनिवर उल्लास | संवेगी || परमेष्ट्यादिक पद तणो, लेदेवा | शिवपुर वास ॥ वि० ॥ १ ॥ सं० ॥ श्रीगुरुसा विचरतां, संकेतपुरी उद्यान ॥ सं० ॥ आव्यो देव जुहारवा, आदिल चैत्य सुध्यान ॥ वि० ॥ २ ॥ सं ॥ करपंकज शिरांजली, सूत्र अर्थ शुरुपाठ ॥ सं ॥ पदसंपद निरती परे, बाला करमनां काठ || वि० ॥ ३ ॥ सं ॥ मन थिरता उपयोगसुं, निज अंधि नेत्र न्यास ॥ सं ॥ श्रवे इम जन देहरे, करवा कर्मनो नाश ॥ वि० ॥ ४ ॥ सं ॥ टाले सदु आशातना, घरतो जीनशुं प्रीत ॥ सं० ॥ चैत्य विनय इलिपरे करे, ते सघृत सुविनीत ॥ वि० ॥ ५ ॥ सं० ॥ विनय इत्यादिक चैत्यनो, करतो मुनिवर तेह | सं० ॥ श्रावे देव जुहारवा, धरणें तिहां गुण गेह ॥ वि० ॥ ६ ॥ सं० ॥ मुनि मन निश्चल जाएगवा, विनयविषय तिथि - वार ॥ सं० ॥ विनयथकी मूकाववा, उपसर्ग करे अपार ॥ वि० ॥ ७ ॥ सं ॥ नागेश नाग घणा करी, वींटया तास शरीर ॥ सं० ॥ तोही चैत्यविनयथकी, चूको नहींय सधीर ॥ वि० ॥ ८ ॥ सं० ॥
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