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________________ अर्थ- ज्यारे जादरवा मासना शुक्लपदनी अगीयारस वायुवाली, अने नोमवारे करीने युक्त होय, व त्यारे ते जलनी देनारी . ॥१५॥ पूर्णिमायां हि जासस्य, सजलं चंप्रमंडलम्। दृश्यते मेघरहितं, तदा वृष्टेरसंगवः ॥ १५ ॥ ॥ अर्थ- जादरवा मासनी पुनमने दिवसें चंजनुं मंडल जो जलसहित तथा वादलाविनानुं देखाय, तो वृष्टिनो असंजव जाणवो. ॥ १५॥ नास्य कृतपंचम्यां, यदा वृष्टिर्न जायते।संध्याकाले तदा मह्यां, शलजोपडवो मतः॥१६॥ अर्थ- ज्ञादरवा मासना कृप्तपदनी पांचमने दिवसें संध्याकाले जो वृष्टि न थाय, तो पृथ्वीपर तीमोनो उपजव थाय, एम मानेलं . ॥१६॥ कृष्लषष्टिदि नापस्य, नौमवारान्विता यदि।समेघा गर्जनैर्युक्ता, सर्वशस्यप्रदामता ॥१७॥ | अर्थ-नादरवा मासना कृष्णपक्षनी बन जो जोमवारी, वादलांवाली अने गर्जारवोथी युक्त होय, तो ||| तणीने सर्व प्रकारनां धान्योने देनारी मानेली . ॥ १७॥ अमावास्यां च नाजस्य, याम्यां हि विद्युतां यदाादर्शनं जायते रात्रौ, तदा धान्य महर्घता, | अर्थ- नादरवा मासनी अमासने दिवसे, रात्रिने दक्षिणदिशामां जो विजलीउनुं दर्शन थाय, तो धान्य बहु मोंधू श्राय.॥१८॥ एवीरीते नादरवा मासर्नु स्वरूप जाणवू. Jain Educationa inte For Personal and Private Use Only W inelibrary.org IITHI All
SR No.600175
Book TitleMeghmala Vichar
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1900
Total Pages68
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size6 MB
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