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कीर्तिचन्द्रनृपसमरविजयकुमारकथा चैवम्
बहुसाहारा पुग्नागसोहिया उच्चसालरेहिल्ला । आरामभूमिसरिसा, चंपा नामेण अत्थि पुरी ॥१॥ तत्थत्थि कित्तिचंदो, नरनाहो सुयणकुमुयवणचंदो । तस्स कणिट्ठो भाया, जुवराया समरविजउ ति ॥२॥ अह हणियरायपसरो, समियरओ मलिणअंबरो सदओ। अंगीकयभद्दवओ, पत्तो सुमुणि ब्व धणसमओ ॥३॥ तम्मि य समए नीरंधनीरपूरेण अइबहुवहंती । भवणोवरिट्टिएणं, दिवा सरिया नरिंदेणं ॥४॥ तो कोऊहलआउलहियओ बंधवजुओ तहिं गंतुं । चडइ निवो इक्काए, तरीइ सेसासु सेसजणो ॥ ५॥ जा ते कोलंति तहिं, ता उवरि जलहरम्मि बुट्टम्मि । सो को वि नइपवाहो, पत्तो अइतिव्ववेगेण ॥ ६॥ निजंति कड़ियाओ, अण्णणदिसासु जेण वेडीओ । थेवो वि तत्थ न फुरद, वाचारो कण्णधाराणं ॥ ७ ॥ तो सरियामझगओ, तडडिओ पुकरेइ पुरलोओ । अह पडुपवणहया निवदोणी उ अदसणं पत्ता ॥ ८॥ लग्गा दीहतमालाभिहाणअडवीइ सा कहिं रुक्खे । तत्तो उत्तरइ निवो, कइवयपरिवारबंधुजुओ ॥९॥ जा वीसमेइ संतो, तत्तीरे ताव पिच्छइ नारंदो । नइपूरस्खणियदुत्तडिदरपयर्ड सुमणिरयणनिहिं ॥१०॥ गंतूण तत्थ सम्मं, पासिय दंसेइ समरविजयस्स । चलियं च तस्स चित्तं, भासुरस्यणुच्चयं द९ ॥ ११ ॥ चिंतइ सहावकूरो, मारितु निवं इमं पगिहामि । तं रज्जं सुहसज्जं, अणिट्ठियं रयणनिहिमेयं ।। १२ ॥ रणो मुक्को घाओ, पुरीइ लोयम्मि पुकरंतम्मि । हा! हा! किमियंति विचिंतिऊण वंचाविओ तेण ॥ १३ ॥
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