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________________ Jain Educatio चडिही । तण्हाछुहाविनडिओ, फलजलरहियम्मि सेलम्मि ॥७०॥ ता तुम्हाणं मज्झे, एगो करिऊण साहसं पुरिसो नित्थारिय सयलजणं, वित्थारउ नियजसं लोए ॥ ७१ ॥ कम्पन्तसयलगत्तं मच्चुभएणेव एगयं बुद्धं । तत्तो स नागदत्तो, जम्पर महुराइ वाणीए ॥ ७२ ॥ आवयपडियाण इमाण जीवियवं समुद्धरंतेण । अज्जिज्जउ सुरलच्छी, | भवया सेसाउणा सुधिरा ॥७३॥ बुट्टो साहइ रे बाल !, अम्ह एरिसममंगलं भणसि । जइ जाणेसि मणुन्नं, ता किं न कुणसि ? इमं कम्मं ॥ ७४ ॥ बाला तरुणा बुड्डा, अधणा सधणा सरोय नीरोया । पुट्ठा सचेऽवि जणा, तवयणं नेव मन्नंति ॥ ७५ ॥ तत्तो स नागदत्तो, चिंतइ नूणं जयम्मि सङ्घस्स । सुहिअस्स य दुहियस्स य, मरणाउ भयं समं चैव ॥ ७६ ॥ भणियं च - सच्चेऽवि सुक्खकखी, सच्चेऽविद्दु दुक्खभीरुणो जीवा । सवेऽवि जीवियपिया, सधे मरगाउ बीहंति ॥ ७७ ॥ साहारणम्मि मरणे, सहावओ इत्थ जायमाणम्मि । जो उवयारं किंचिवि, करेइ सो जीवइ जयम्मि ॥ ७८ ॥ पारेवयस्स य कए, तुलाइ चढिऊण तोलयंतेणं । वज्जाउहेण रण्णा, जसेण संजीविओ अप्पा ॥ ७९ ॥ एयाणं पाणीणं, जइ दाउं जीवियं मरिस्समहं । तो मे किंपिचि नहु सोयणिज्जमत्थित्थ भुवणम्मि ॥ ८० ॥ सज्जीकाउं पोए, तुम्भेहिं सावहाणचित्तेहिं । ठायवमिय भणित्ता, स नागदत्तो गिरिं पत्तो ॥ ८१ ॥ तत्ताडियढक्कार वसंखुद्ध नियंतयाण पक्खीणं । पक्खपवणेण पोया, पणुलिया निग्गया तत्तो ॥ ८२ ॥ सिंहलदीवम्मि गए, रण्णाओ - मुक्कसुक्कए पोए । पडिभंडेणं भरिउं, पत्ता वणिणो सनयरम्मि ॥ ८३ ॥ सुणिउं ताणागमणं, नंदणदंसणसमूसिओ - onal For Private & Personal Use Only jainelibrary.org
SR No.600143
Book TitleSamykatva Saptati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1916
Total Pages506
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size10 MB
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