________________
नवपद
वृत्तिम्मू. देव. वृ. यशो.
॥ २० ॥
Jain Education Inte
कमेण सुत्तपरिवाडीए सुत्तं लहंतो झूरेइ, तओ आयरिए विन्नवेइ - मज्झ कंचि वायणायरियं पयच्छह, तेहिंपि दुब्बलिय| पूस मित्तो से वायणायरिओ दिण्णो, कइवय दिणाणि विंझरस वायणं दाऊण गुरुं भणइ - भयवं ! मम वायणं दितरस | सेससुयमगुणिज्जमाणं न ठाइ, तओ-जं सन्नायगगेहे मुक्कं जं संपयंच न गुणेमि । तेण समत्तंपि सुयं गलिही मम करयलजलं व ॥१॥ तओ चिंतियं गुरूहिं- सुरगुरुसमबुद्धिस्सवि निच्च झतस्स जइ सुयमिमस्स । हंत विणरसइ (Sसइ) ता का गणणा सेस पुरिसेसु ? ॥१॥ अइसयकओवओगेण य नायं, जहा इओपभिइ सुयमेधाधारणाइपरिहीणे सीसे होर्हिति, तओ तेसिं अणुग्गहढं चउरोऽवि अगुओगे वीसुं कासी, भणियं च - " जावंति अज्जइरा अपुहुत्तं कालियाणुओगस्त ।। तेणारेण पुहुत्तं कालियसुय दिट्टिवाए य ॥ १ ॥ देविंद दिएहिं महाणुभावेहि रक्खियज्जेहिं । जुगमासज्ज विहत्तो अणुओगो तो कओ चउहा ॥ २ ॥ कालियसुयं च इसिभासियाई तइया य सूरपण्णत्ती । सन्धोऽवि विडिवाओ चउ. त्थओ होइ अणुओगो ॥ ३ ॥ " देविंदबंदियत्तं च जहा तेसिं तहा साहिज्जइ - " ते कइयवि संपत्ता विहता गामनगरमाईसु । महुराउरिं समिद्धं भूयगुहाचेइयं तत्थ ॥ १ ॥ तंमि ठिया भयवंतो इओ य सोहम्मसुरवई पत्तो । खेत्ते महाविदेहे, सीमंधरसामिपासंमि || २ || अभिवंदिऊण पुच्छइ तित्ययरं सामि ! केरिसा एत्थ । हुंति निओया
For Private & Personal Use Only
मिथ्यात्वे गोष्ठामाहि
लवृत्तं
१०
॥ २० ॥
so ww.jainelibrary.org