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नवपद- वृत्तिमू देव.
वृ. यशो.
॥१९॥
नरसुरसुहाई ॥१॥” तओ दिण्णा सव्वे, पुणो अप्पणो निमित्तं गएण लद्धं घयमहुजुत्तं परमन्नं, आगंतूण भुत्तं, मिथ्यात्वे तदिवसाओ चेव जाओ विसिडलद्धिसंपण्णो सयलगच्छोवयारी, तम्मि य गच्छे अन्नेऽवि परमलद्धिसंपन्ना तिण्णिमा
गाष्ठामाहिमुणिणो, तंजहा--वत्थपूसमित्तो घयपूसमित्तो दुब्बलियपूसमित्तो, तत्थ वत्थपूसमित्तस्सेसा लडी-दव्वओ जत्तिएहि १० वत्थेहिं गच्छरस पओयणं तत्तियाइं आणेइ, खेत्तओ महुराए, कालओ सिसिरे वासारत्ते वा, भावओ जहा काएवि. दुग्गयमहिलाए छुहाए मरंतीए गुरुकिलेसेण कत्तिऊण वुणाविया एक्का पोत्ती, कल्लं सुंदरे दिवसे परिहिस्सामिति । धरिया, एत्यंतरे जइ सो पत्थेइ तो हहतुट्ठा देइ १ घयपूसमित्तस्स उ दवओ जत्तिएण गच्छे सरइ तत्तियं घय माणेइ, खित्तओ उज्जेणीए, कालओ जेट्ठासाढमासेसु, भावओ जहा-एगा बंभणी गुन्धिणी नियभत्तारं जाइरोरं मज्झ पसवणकाले घएण कजं होही त भिक्खिऊण मेलिहित्ति भणियाइया, तेणावि कहकहवि पलियं पलियम-ल ग्गाहंतेण पइदिणं हिं मासेहिं पूरिओ घयकुडओ, समप्पिओ भट्टिणीए, जाइओ घयपूसमित्तेण, सव्यं देइ हतुहा २ दुब्बलियपूसमित्तो उण निच्चमेव सज्झायवावडो, तेण नव पुव्वा अहिया अहिज्जिया, सुत्तत्थगोयराए ॥ १९ ॥ निरंतरं चिंताए जाओ दुब्बलो, जइ नाणुप्पहेइ तो सवपि सुयं पम्हुसइ, अओ चेव दुब्बालयपूसमित्तोत्ति पत्तो
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